जिंदगी किसी की है ?

सिर्फ तुम्हारी ही नहीं  है, यह जिंदगी,
जिसने दि है, उस की  ही  है, यह जिंदगी ।
उसी के ईशारों से चलती है,  यह जिंदगी,
उसी की मर्जी से जीना है, यह जिंदगी,
वो जैसे रखे एसे ही जिना है, यह जिंदगी ।

सिर्फ तुम्हारी ही नहीं  है, यह जिंदगी,
जिस ने सँवारी है, उसी की भी है, यह जिंदगी
उन की खुसी के लिए ही जीना है, यह जिंदगी ।

सिर्फ तुम्हारी ही नहीं  है, यह जिंदगी,
परिवार, समाज, प्रकृति और
देश का भी है अधिकार यह जिंदगी पे ।

दूसरों की बदोलत है, यह जिंदगी
सब की ऋणी है, यह जिंदगी,
सब का ऋण चुका ना है ।

ईसलिए सब के लिए ज्यादा और
खुद के लिए कम जीना ही  जिंदगी है  ।
                                                   विनोद आनंद

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