भूला भटका मानव

चाह बदल गई, राह बदल गई
तो मंझिल अपने आप बदल गई ।
चाह और राह में भटका हुआ मानव
पाथ भूला मानव, पहेचान भूल गया,
जिंदगी का मकसद भूल गया ।

क्या करना है, क्या कर रहा है,
कहाँ जाना है,  कहाँ जा रहा है ।
धन दौलत,तृष्णा के भँवर में फसाँ
मानव ने, मानवता और जमीर बेच दी ।

अवगुणों और बूरी आदतों का शिकार
मानव असली स्वभाव खो चूका ।
ईन्द्रिय सुख, मन नी मन मानी से हारा
हुआ मानव, पशु या दानव बन रहा है ।

फिरसे मानव बनने की चाह और
मानवता की राहाँ पे चलना है ।
जिंदगी का मकसद समजकर
मानव बनकर, असली स्वभाव को
आत्मसात करना है वर्ना जन्म मरण
के फेरो में फसाँ रहेगा मानव ।

दिन में भूला बुध्धु श्याम को घर
आये तो उसे भूला नही कहते ।
अभी भी समय है वापसी का,
लौट आओ तो होगा कल्याण ।

विनोद आनंद                                22/05/2016
फ्रेन्ड, फिलोसोफर, गाईड

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