इतना भी…..

इतना भी मीठा न बनो,
की लोग तुम्हे निगल जाए ।
इतना भी कडवा न बनो,
की लोग तुम्हे थूंक दे ।
इतना भी व्यस्थ न रहो,
की अस्त व्यस्थ हो जाओ ।

इतना भी गुस्सा न करो,
की खुद बेकाबू हो जाए ।
इतना भी औपचारीक न बनो,
की रीश्ते आंखे चुराए ।
इतना भी लागणीवश न बनो,
की लोग फायदा उठाए ।

इतना भी भोले न बनो,
की धोखा खाते रहो।
इतना भी न सोया करो,
की लोग तुम्हे कुंखकर्ण कहे ।
इतना भी आलसी न बनो,
की तुम्हारा वर्तमान छूट जाए ।
इतना भी परेशान मत हो,
की मुशक्लि हो जाए जीना ।

इतना भी तनावग्रस्त न हो,
की तुम टूट के बिखर जाओ ।
इतना भी बेजिम्मेदार न बनो,
की लोग बेकार कहने लगे ।
इतना भी अकड न दीखाओ,
की टूट कर चूर चूर  हो जाओ ।

जिंदगी एसे भी न जिओ
की जिना बोज लगे ।
समतुलन, मर्यादा मे रहकर जिओ
और अति के आतंक से बचो ।
यही है सही जिने का तरीका ।

विनोद आनंद                             03/06/2016
फ्रेन्ड, फिलोसोफर, गाईड

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