मुक्ति

​जिंदगी को जैल बनाकर

हम आजिवन कारावास

की सज़ा भुगत रहे है ।

हम पल पल जाने अनजाने

गुन्हा करके आजिवन कैद

हमे रास आ गई है ।

दुर्गुणो,दुष्ट विचारों और

ईरादे, गलत आदतें, अशुभ

और अमंगल भावनए, गलत 

व्यवहार और दुष्कर्म के 

साथ जीना ही गुन्हा है ।

उस गुन्हाओं कि सज़ा हम, 

कई परेशानी, तकलीफें और 

मुश्केलीयों के रूप में भुगत रहे है । 

फिर भी उसे मुक्त होना नही सोचते 

या नही चाहते, और सज़ा भुगत रहे है ।

स्वसुधार, परिवर्तन और 

नवीकरण ही श्रेष्ठ उपाय है 

जिंदगी कि जैल से और परेशानी, 

तकलीफें, मुश्केलीयों से मुक्ति पाने का ।

विनोद आनंद                             23/07/2016

फ्रेन्ड, फिलोसोफर, गाईड

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