शेर शायरीयों का गुलदस्ता 14

​फूरसत

फूरसत नही किसी को 

जीने कि या मरने कि ।

लेकिन फूरसत है, 

कैसे भी जीने कि ।

कहते समय नही है

कई घंटे बीता दे है

व्यर्थ कामो में, 

मौज-शौख में ।

कभी फूरसत से सोचो कि, 

जिंदगी कैसे जीनी है ।                                             

कर्ज 

मिलती नही जिंदगी मूफ्त में

लेकिन हम मूफ्त में गवाँ देते है ।

मिली है जिंदगी, कर्ज चूकाने को ।

जिंदगी युही गवाँ के, सर पे  

ओर कर्ज  बढा देते है ।

सद् कर्म

जिंदगी जीना है और

जिंदगी बनाने कि भी  है

किस्मत से मिला है वो

भूगतना है और नया 

सद् कर्मो से किस्मत

बनाने कि भी है ।
गुलशन या रेगिस्तान

जिंदगी में हसी खुशीयों के

फूल खिलाना है ।

मानवता कि खुशबू से 

जिंदगी को गुलशन बनाना है ।

जिंदगी में गम और निराशा के 

कांटे खिलाकर जिंदगी को

रेगिस्तान नही बनाना । 

विनोद आनंद                            24/08/2016       फ्रेन्ड, फिलोसोफर, गाईड 

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