पहेले और अब 

​कहाँ गई है शर्म जो 

पहेले आँखो मे रहती थी ।

अब बेशर्मी है ।

कहाँ गई है दया जो

पहेले दिल में रहती थी ।

अब क्रूरता है ।

कहाँ गई है मासुमीयत जो

पहेले चहेरे पे रहती थी ।

अब गुरूर है ।

कहाँ गई है मीठास जो

पहेले जूबा में रहती थी ।

अब कटूता है ।

कहाँ गया है प्रेम जो

पहेले मन में रहेता था ।

अब मोह है ।

कहाँ गया है ईमान जो

पहेले ईन्सानो में  था ।

अब बेईमानी है ।

कहाँ गया है वो रिश्ते जो

परिवार में फले फूलते थे 

अब रिश्ते नाम के है ।

जो अब है, वो ईन्सान नही ।

जो पहेले था, वो ईन्सान था ।

पहेले जो था उसे लौटना होगा ।

ईन्सान का गौरव निभाना होगा ।

विनोद आनंद                         11/10/2016           फेंन्ड, फिलोसोफर,गाईड

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