जीवन एक नदी

​जीवन एक नदी बहेता रहे

जैसे नदी पहाडो से निकलकर

बडे पत्थरो से टकराकर बहेती है ।

एसे जीवन टेढे मेडे रास्तो से

नदी कि भाँति  बहेते रहेता है ।

जीवन नदी के दो किनारे  है  ।

एक किनारा मुश्केली,दु:ख, 

असफलता, चिंता, तनाव का ।

दूसरा किनारा प्रेम, आनंद

सुख, शांति और सफलता का ।

कभी ईस किनारे को तो कभी

उस किनारे को छूते बहेती 

रहती है जीवन कि नदी ।

आखिर नदी समुद्र को मिलती है

जीवन कि नदी लक्ष्य पा लेती है

अगर जीवन नदी जैसे बहेता रहे ।

नदी का बहेता पानी निर्मल और 

शुध्ध रहेता है एसे बहेता जीवन

निर्मल और शुध्ध रहेना चाहिए ।

जैसे नदी गीत गाते गाते,परोपकार

करके बहती रहती है, एसे जीवन कि 

नदी गुन गुना के पसन्न होकर और 

परोपकार करके बहेती रहेनी चाहिए ।

विनोद आनंद                          16/10/2016         फेंन्ड, फिलोसोफर,गाईड

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