जंग खुद के खिलाफ

​जिंदगी जंग है खुद के खिलाफ

खुद ही दुश्मन है हम खुद के ।

न हम खुद को जानते 

न पहेचान ते है ।

न हम अपनी फिक्र करते

न अपना कल्याण चाहते है ।

हम खुद के दुश्मनों से बेखबर

कैसे लडेगें जंग खुद के खिलाफ ।

काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद और ईर्षा

जानी दुश्मन छूपे है हमारे मनमें

जब तक वो है न सुख, शांति 

न चैन है, फक्त परेशानी, दु:ख,

अशांति और बैचेनी मिलेगी ।

करो एलाने जंग उस के खिलाफ ।

एक एक को चुन चुन के खत्म करो

फिर जिंदगी बनेगी जीने लायक 

वरना जिना पडेगा  मर मर के।

दुश्मनो कि छाँवमें न सुरक्षित

न सुखी, न शांत तो कैसी 

 बसर होगी जिंदगी ? जरा सोचो ।

विनोद आनंद                            20/12/2016      फेंन्ड, फिलोसोफर,गाईड

 

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