689 तो प्रेम हो प्रगट 

कहे दो कोई न करे 

एसा प्रेम जो हो

शर्तो का मोहताज, 

जो हो कामना या

वासना का मोहताज, 

जो हो ईच्छा या 

स्वार्थ का मोहताज ।

क्यूंकि एसा प्रेम है कलंक ।

कहे दो सभी करे

एसा प्रेम जो हो

बीन शर्ती, नि:स्वार्थी ।

कहे दो सभी करे

एसा प्रेम जो न हो

कामनाओ, ईच्छाओ या

वासना का मोहताज ।

एसा प्रेम भक्ति है क्यूंकि 

प्रेम ईश्र्वर का स्वरूप ।

प्रेम कैसे करे ? 

किसी को नफरत, धृणा

तिरस्कार न करो तो 

प्रेम होगा मन में प्रगट ।

किसी कि निंदा न करो, 

इर्षा न करो, बदला न लो

तो प्रेम होगा मन में प्रगट ।

सब के प्रति सद् भाव

और सम् भाव रखो तो

प्रेम होगा मन में प्रगट ।

ईश्र्वर में श्रध्धा रखो, 

ईश्र्वर में विश्र्वास करो

और तन मन से समर्पीत, 

नि:ष्काम भक्ति करो तो

प्रेम होगा मन में प्रगट ।

प्रेम सद् गुणों का राजा ।

प्रेम शांति का दूत और

आत्म कल्याण का मार्ग है ।

प्रेम एक तपस्या और

ईश्र्वर को प्रगट करने का

सरल हो उत्तम साधन ।

प्रेम करो और प्रेम पाओ ।

विनोद आनंद                          07/03/2017 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

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