891 रुठना मनाना

रुठना-मनाना ही जिंदगी है ।

सोचो खाने में नमक नहीं तो

जैसा लगेगा खाने एसे ही 

लगेगी जिंदगी अगर न रुठना

और न मनाना  हो ।

सोचो नमक ज्यादा हो जाये तो 

जैसा लगेगा खाना एसे ही लगेगी

जिंदगी,जब रुठना मनाना हो ज्यादा ।

सोचो नमक कम हो जाये तो 

जैसा लगेगा खाना एसे ही लगेगी

जिंदगी, निरस और बेस्वाद  ।

सोचो नमक प्रमाणसर हो तो 

जैसा लगेगा खाना एसे ही लगेगी

जिंदगी,जब रुठना मनाना हो प्रमाणसर ।

रुढना मनान भी हो लेकिन क्षणीक, 

पल में रूढना पल में मान जाना तो

जिंदगी लगती है मीठी और स्वादिष्ट ।

ध्यान रहे रुठना-मनाने में कभी 

प्रेम न हो कम बलकी, ओर बढे 

और जिंदगी सँवरें ।

विनोद आनंद                                 18/08/2017

फेंन्ड, फिलोसोफर,गाईड

 

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