1639 दस्तुर है कुदरत का

किसी को बेईज्जत करने से
ईज्जत कौन करेगा, ईन्सान
तो क्या भगवान भी ईज्जत
नहि करेगा । बेईज्जती से
ईज्जत नहि खरीद शकते ।
किसी का अपमान करके मान
पाने कि उमीद रखना मूर्खता है ।
किसी को दुःखी करके खुशी
का इन्तज़ार करना व्यर्थ है ।
किसी कि मुश्केली बढाकर
आराम या चैन कि चाहत
रखना बेवकूफि है । किसी का
बुरा करके अच्छा दोस्त पाने
का स्वप्ना देखना स्वप्न हि है ।
हर वक्त गुस्सा और नफरत का
सामान बांटने से प्रेम या शांति
नहि मील शकती ध्यान रखे ।
किस को धोखा देकर अपनों
से मुँह फेर लेने से अपनापन
नहि मिल शकता है । यह सब
नग्न बातें कहेती है कि जो
चाहिए वो हि देते रहो तो मन
चाहि चीजें मिलती हि रहेगी,
वरना तरसते रहोगे जिंदगी भर ।
पेड बबुल का लगाकर आम
कहाँ से खाओगे । जो दोगे वो
मिलेगा, दस्तुर है कुदरत का ।
विनोद आनंद 20/06/2019 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

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