779 धार्मीक – सफल व्यक्ति

धार्मीक व्यक्ति :

धीरज नही छोडना, क्षमावान बनीए, 

चोरी छल कपट से बचना, 

हिंसा को त्यागीए, 

प्रेम पूर्ण हो जाईए, 

ज्ञान कि अभिवृध्धि किजीए, 

समजदार बनकर चलिए, 

खुद पर कन्टोल करना शीखलो

अपने गुस्से को और मन को 

नियंत्रीत करना शीखना 

मन स्मृति में यह धार्मीक व्यक्ति है ।

सफल व्यक्ति :

तुम्हारी आत्मा आनंद से भरपूर रहे, 

आनंद के सागर में  तुम्हारी आत्मा 

हररोज डुकबी लगाए । 

तुम्हार मन समतुलीत हो और 

शांति से भरपूर हो ।

तुम्हारी बुध्धि  विवेकी हो, 

दूर द्रष्टि हो और धर्म से जूडी रहे । 

जीवन तुम्हारा प्रेम पूर्ण हो

मानो के तुम प्रेम नगरी में  

रहते हो और चहेरे पे 

मुस्कान बनी रहे ।

वो ही व्यक्ति सफल व्यक्ति है

सुधांनसुंजी महाराज प्रवचन 

के सौजन्य से                               19/05/2017

669 जागो और जगाओ

खुदको जगाओ और 

दूसरों को भी जगाओ ।

जागना है निंद से समयसर

वरना देरी हो, जाएगी बैरी, 

ईसलिए जागो और जगाओ

जागना है मन को 

जो है भोग विलास में 

वरना जिंदगी बीत जाएगी

न कुछ कर शकोगे ।

ईसलिए जागो और जगाओ

जगाना है भावनाओ को

दिल में वरना भावनाहीन

जीवन है जानवर समान ।

ईसलिए जागो और जगाओ

जगाना है अच्छे विचारों को

वरना नही  रोक पाओगे

बुराईओ को ईसलिए 

जागो और जगाओ ।

जगाओ आत्मा को

आत्मशक्ति को वरना

होगी आत्मगानी ।

ईसलिए जागो और जगाओ ।

विनोद आनंद                          16/02/2016      फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

​ढूंढते है हम जो खो गया है

​ढूंढते है हम जो खो गया है

लेकिन क्या खो गया ? 

सुख, चैन, और शांति ।

सब कुछ है मगर 

सुख, चैन और शांति नही है ।

क्यूकि हम उन्हे जहाँ नही है

वहाँ ढूंढते है, बेखर है हम ।

हम चीजों में,धन दौलत में

ढूंढते है सुख, चैन,और शांति ।

शायद मिल भी जाय तो, 

वो नही है  शाश्र्वत ।

तो कहाँ है सुख, चैन, शांति ।

ज्ञानी कहते है कि वो 

मनुष्य के अतःकरण में 

गहरी निंद में सोई है ।

उन्हे जगाना है,लेकिन कैसे ? 

अपनी सोच,नजरिया और

मान्यता बदलनी है । 

हम शरीर के निवासी 

अविनासी,नित्य आत्मा है, 

जो अंश है परमात्मा का ।

हमारे अत:करण में जो है वो

भूल चूके है,उसे बहार ढूंढते है ।

बस सिर्फ याद करना है और

जिवन में सद् विचार और

सद् आचरण करना है, तुम्हे

शाश्र्वत सुख, चैन, और 

शांति अवश्य मिल जाएगी ।

विनोद आनंद                            07/01/2017      फेंन्ड, फिलोसोफर,गाईड 

बहिर्मुख या अंतर्मुखी

​जिंदगी जीने का तरीका

बहिर्मुख है जैसे हमारी

सब इन्दियाँ बहिर्मुख है ।

हमारी जिंदगी पर भौतिक 

चीजों पर आधारित है ।

अपनी सोच भी बहिर्मुख है ।

हमे अपनी जिंदगी जीनेका 

तरीका अंतर्मुखी करना है

हम बाहारी चीजों से  शांति

और खुस रहेना चाहते और

आनंदित रहेना चाहते ।

हमे अतर्मुखी बन के अंतःकरण, 

मन, बुध्धि और आत्मा को

शुध्ध, पवित्र और शांत करना है

फिर अपनी जिंदगी बहार कि 

चीजों कि मोहताज नही होगी ।

बहार कि परिस्थिति कैसी भी

हो आप कि खुसी, शांति को

छीन शकता और आप कि जिंदगी 

सफल और सार्थक होगी ।

विनोद आनंद                               28/11/2016         फेंन्ड, फिलोसोफर,गाईड

मानव जन्म हो सफल

​घर को सजाना ताज़ा फूलो से

तन को सजाना अच्छे कपडों से

मन को सजाना अच्छी सोच

और सकारात्मक विचारो से ।

खुद को सजाना है सद् गुणों से और 

दुर्गणों का कुडा कचरा साफ करके ।

जिंदगी को सजाना कुछ नियमों

से सिध्धांतो, कर्मो,सफलता से

और गलत आदतों को मिटाके ।

आत्मा का सजाना ईश्र्वर कि

प्रार्थना और उपासना से ।

यह सब सजाना आ जए तो, 

मानव जन्म हो जएगा सफल ।

विनोद आनंद                           28/08/2016       फ्रेन्ड, फिलोसोफर, गाईड

किस का कल्याण किस में 

​आत्मा का कल्याण परमात्माना 

साक्षात्कार और मोक्ष में ।

मन का कल्याण मन के संयम में ।

बुध्धि का कल्याण सही निर्णय में ।

शरीर का कल्याण तन्दुरस्ती में ।

मानव का कल्याण आत्मा कल्याण में ।

परिवार का कल्याण सुख शांति मे ।

संबंधीओ का कल्याण रिश्ते निभाने में ।

समाज का कल्याण सब के कल्याण में ।

देश का कल्याण देश कि समृध्धि, 

और देशवासीओं कि खुसाली में ।

विश्व का कल्याण विश्व शांति में ।

जिस का जिस में हो कल्याण

हे ईश्वर उसे उसका ही दो वरदान 

चलो यही प्रर्थना करे तो, 

‘ वसुध्धेव कुटुंम्बकम्, 

का स्वप्न हो सिध्ध ।

विनोद आनंद                               27/08/2016   फ्रेन्ड, फिलोसोफर, गाईड

बस इतना ही कहेना है

बस इतना ही कहेना है आपसे की
आप अपनी अंतरात्मा की सुनो
ईश्वर की सुनो, गुरु-सदगुरू की सुनो ।
मगर मन-ईन्द्रियों की न सुनो ।

अंतरात्मा – मन, बुध्धि,
आत्मा का त्रिवेणी संगम,
मेल जूल,सहयोग तीनो में
ईन्द्रियो पर पा शकते हो काबू ।
बस इतना ही कहेना है आपको ।

ईन्द्रियाँ अपने विषयों की कामना
में मस्त है और बहेकने लगती है ।
मन भी नही बच सकता विषयों से ।
मन को छूडाना है काम वासना से ।
बस इतना ही कहेना है आपको ।

विशुध्ध-विवेक बुध्धि और
ज्ञान-आत्मा के संस्कार ही
मन पर नियंत्रण कर शकते है,
समझा के या जबरजस्ति से ।
संयमी मन ईन्द्रियाँ को विषयों की
काम वासना से मुक्त कर शकता ।
बस इतना ही करना है आपको ।
बस इतना ही कहेना है आपको ।

विनोद आनंद                         05/02/2016
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड