952 संकल्प-सृष्टि

संकल्प से सृष्टि

या सृष्टि से संकल्प ।

ईश्र्वरने संकल्प से 

सृष्टि बनाई है ।

सृष्टि का मतलब परिस्थिति

हम परिस्थिति से संकल्पयानि सोचते है, वो सही नहीं ।

संकल्प का मतलब सोच 

सोच से परिस्थिति का निर्माण

सही तरीका है सृष्टि के निर्माण का ।

पहेले संकल्प यानि सोच 

सोच से सृष्टि का निर्माण ।

हम परिस्थिति आधारित

संकल्प करते है सोच ते है

इसलिए परिस्थिति ओर

बीगती जाती है । 

हमे अपनी अच्छि सोच से 

संकल्प करना है तो अच्छि 

बनेगी सृष्टि । अच्छि सोच

अच्छि परिस्थिति और 

अच्छि परिस्थिति यानि

अच्छि सृष्टि का निर्माण ।

संकल्प से सृष्टि सही है ।

सृष्टि से संकल्प सही नहीं है ।

विनोद आनंद                               25/10/2017     फेंन्ड, फिलोसोफर,गाईड

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947 ज्ञान

ज्ञान सबसे महान

सबसे पवित्र और पूजनीय ।

ज्ञान का देवता है सूरज, 

करता है दुनिया में उजाला, 

ज्ञान करता है जीवन में उजाला ।
राजा पूजनीय देश में 

ज्ञानी पूजनीय सर्वत्र ।

ज्ञान उजाला और 

जीवन कि रोशनी 

अज्ञान जीवन का अंधकार ।

ज्ञान बीना जग सुना निरश

ज्ञान ही सब कुछ जीवन में ।

ज्ञान संग भक्ति जूडे तो ज्ञानी 

भक्त ईश्र्वर को अति प्रिय ।

ज्ञान ईश्र्वर, ईश्र्वर ही ज्ञान है ।

ज्ञान कि गंगा बहाते चलो 

भक्ति का यमुना बहाते चलो

जीवन को सफलता,सार्थकता

समृद्धि कि दिशा दिखाते रहो ।

ज्ञानी बनो अज्ञानी नही 

ज्ञान होते हुए भी ज्ञान का

ईस्तमाल न करे वो है मूढ ।

विनोद आनंद                               11/10/2017

फेंन्ड, फिलोसोफर,गाईड

853 💐 शेर शायरीयों का गुलदस्ता-37

💞 स्वर्ग भी बसेगा 

माया का पर्दा खुलेगा तो 

ईश्र्वर का दर्शन भी होगा ।

दर्शन भी होगा दिल भी मिलेगा ।

दिल भी मिलेगा तो प्रेम भी बरसेगा ।

प्रेम भी बरसेगा तो दिल भी खिलेगा ।

दिल भी खिलेगा तो खूशबु भी फैलेगी ।

खूशबु भी फैलेगी तो माहोल महेंकेगा ।

माहोल महेंकेगा तो धरती, 

पर स्वर्ग भी बसेगा ।

👪 संबंध को समझो 

प्रेम से संबंध खिलते है, 

नफरत से मुरझाते है ।

सेवा से संबंध बढते है

स्वार्थ से संबंध घटते है ।

प्रशंसा से संबंध कायम रहेते है ।

निंदा से संबंध हंगामी रहते है ।

समर्पण से संबंध मजबूत बनते है

हक छीनने से संबंध मरते है ।

मीठे वचन सही व्यवहार से, 

संबंध शाश्र्वत बनने है ।

कटु वचन, गलत व्यवहार से, 

संबंध टूटते है ।

मिलते जुलते रहनेसे, 

संबंध निखरता है ।

ताल मेल मिलाते  रहोगे, 

तो संबंध सँवरता है ।

संबंध को समजो, 

तो जीवन सँवरेंगा ।

💝 आप निर्देशक हो

मन शुध्ध है तो स्वर्ग,  

मन अशुध्ध है तो नर्क  ।

मन पवित्र है तो स्वर्ग ,  

मन अपवित्र है तो नर्क  ।

मन सकारात्मता है तो स्वर्ग , 

मन नकारात्मता है तो नर्क  ।

मन शांत तो है तो स्वर्ग

मन अशांत है तो नर्क है ।

मन संत हो तो स्वर्ग, 

मन शैतन है तो नर्क ।

मन ही निर्माता है 

स्वर्ग या नर्क का ।

आप निर्देशक है ।

क्या चाहते हो स्वर्ग या नर्क ? 
विनोद आनंद                                20/07/2017

फेंन्ड, फिलोसोफर,गाईड

768 जीने का शलीका नही आया

ओ जीने वाले तुझे जीन का

सही शलीका नही आया ।

जीवन एक उपवन है तुने

कांटो का बन बना दिया ।

जीवन खूबसूरत है तुने

बदसूरत बना दिया ।

जीवन अनमोल है तुने

किंमत लगाली,बोली लगाली ।

जीवन का सफर आत्म

कल्याण के लिए है तुने 

काया कल्याण में लगा दिया ।

हे मानव ! तुझे जीन का 

सही शलीका नही आया ।

जीवन सेवा समर्पण के लिए

तुने खुद कि मावजत में  लगा दिया ।

जीवन, पुण्य आशीर्वाद और 

कृपा कमाने के लिए तुने पाप

और पैसा कमाने लगा दिया ।

जीवन ईश्र्वर मिलन के लिए तु

ईश्र्वर के वियोग में जीने लगा ।

हे मानव ! तुझे जीन का 

सही शलीका नही आया । 

जीवन सिर्फ जीना नही

जीवन को जीतना भी है ।

विनोद आनंद                               07/05/2017

फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

689 तो प्रेम हो प्रगट 

कहे दो कोई न करे 

एसा प्रेम जो हो

शर्तो का मोहताज, 

जो हो कामना या

वासना का मोहताज, 

जो हो ईच्छा या 

स्वार्थ का मोहताज ।

क्यूंकि एसा प्रेम है कलंक ।

कहे दो सभी करे

एसा प्रेम जो हो

बीन शर्ती, नि:स्वार्थी ।

कहे दो सभी करे

एसा प्रेम जो न हो

कामनाओ, ईच्छाओ या

वासना का मोहताज ।

एसा प्रेम भक्ति है क्यूंकि 

प्रेम ईश्र्वर का स्वरूप ।

प्रेम कैसे करे ? 

किसी को नफरत, धृणा

तिरस्कार न करो तो 

प्रेम होगा मन में प्रगट ।

किसी कि निंदा न करो, 

इर्षा न करो, बदला न लो

तो प्रेम होगा मन में प्रगट ।

सब के प्रति सद् भाव

और सम् भाव रखो तो

प्रेम होगा मन में प्रगट ।

ईश्र्वर में श्रध्धा रखो, 

ईश्र्वर में विश्र्वास करो

और तन मन से समर्पीत, 

नि:ष्काम भक्ति करो तो

प्रेम होगा मन में प्रगट ।

प्रेम सद् गुणों का राजा ।

प्रेम शांति का दूत और

आत्म कल्याण का मार्ग है ।

प्रेम एक तपस्या और

ईश्र्वर को प्रगट करने का

सरल हो उत्तम साधन ।

प्रेम करो और प्रेम पाओ ।

विनोद आनंद                          07/03/2017 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

682 प्रतिबंध

प्रतिबंध किसी चीज़ के 

ईस्तमाल पर हो वो चीज़

बाजार में नहीं मिलती ।

लोक कल्याण कि खातरी

किसी चीज़ पर प्रतिबंध 

लगाया जाता है ।

उदाहर के तोर पे दारु पर 

गुजरात में प्रतिबंध है ।

जिसे दारु के प्रकोप से 

गुजरात कि प्रजा बच शके ।

लेकिन सिर्फ गुजरात में क्यूं ? 

किसी दूसरे राज्यमें क्यूं नही ? 

प्रतिबंध हो तो पूरे भारत में हो ।

जिस राज्यमे नही प्रतिबंध वहाँ से

दारू अधिक किंमत में आती है ।

प्रतिबंध करना है तो पीने पर 

और बीकने पर नही लेकिन 

प्रतिबंध दारू के उत्पाद पर 

हो तो प्रतिबंध सफल हो जाए ।

प्रतिबंध  प्रशासन का हो न हो

लेकिन व्यक्ति खुद पर प्रतिबंध

लगाना है कि जो हानीकार है

उसका सेवन करके व्यसनी न बने ।

व्यक्ति खुद और मन पर संयम रखे

वोही सही और सफल प्रतिबंध है ।

ईश्र्वरने व्यक्ति को मन बुध्धि दि है

कि वो समज शके क्या गलत है ? 

क्या सही है ? क्या हानीकारक ? 

और लाभदायी  है ?  फिर भी 

जानबुझ व्यक्ति गलती करके

हानी कारक को अपना कर व्यसनी 

बने तो प्रतिबंध सफल न हो शके ।

विनोद आनंद                           01/03/2017 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

 

कोई नही मात पिता जैसा

​कोई  नही एसा ईश्र्वर के बाद

जो तुम्हे करे प्यार और पालन, 

जो तुम्हे अपना समजे और संभाले, 

जो तुम्हारा कल्याण और भला करे, 

मात पिता जैसा ।

कोई  नही एसा ईश्र्वर के बाद
जो तुम्हे कडवे वेण बोले, 

जो तुम्हे रास्ता दिखाए  

जो तुम्हारा साथ निभाए  

जो तुम्हारी भूल को माफ़ करे  

मात पिता जैसा ।

कोई  नही एसा ईश्र्वर के बाद, 
जो दु:ख सहन करके तुम्हे खुस रखे, 

जो खुद कम खाके तुम्हे खिलाए,   

जो  खुद जागे और तुम्हे सुलाए, 

मात पिता जैसा ।

विनोद आनंद                              17/09/2016    फ्रेन्ड, फिलोसोफर, गाईड