897 जिंदगी जंग के स्वर्ग

जिंदगी जंग हम सिपाही ।

रहना है जागृत,चौकना और 

तैयार दुश्मनों से जंग खेलने को ।

अंदर दुश्मन, बहार दुश्मन ।

घर में दुश्मन,समाज में दुश्मन 

जहाँ आँख खोल के देखो

दुश्मन ही दुश्मन देखाई देंगे ।

जिंदगी को जंग बना देते है ।

अंदर के दुश्मन है….. 

काम, क्रोध, लोभ, मोह, 

मद और मत्सर-ईर्ष जो देते है

बहार के दुश्मन को जन्म ।

ईसलिए पहेले जंग खेलकर 

उन पर जीत हासील करनी है ।

फिर न होगा कोई बहारी दुश्मन ।

कैसे खेलेंगे जंग अंदर के दुश्मन से ।

जीवन में दुर्गुणो से मुक्ति, 

बूरी आदतों छूटकारा पाकर

सद् गुणी बनकर अपने 

व्यक्तित्व को निखारना है

सवाँरना है और जिंदगी का

जंग पर जीत हांसल करनी है ।

फिर न होगा कोई दुश्मन ।

सभी होंगे दोस्त फिर जिंदगी 

जंग नही है, जिंदगी स्वर्ग है                                     विनोद आनंद                                24/08/2017     फेंन्ड, फिलोसोफर,गाईड 

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821💐शेर शायरीयों का गुलदस्ता-34

💛 यकीन नही होता

सोच ने से नही थकाता

लिखते लिखते नही थकाता

कहते कहते नही थकता लेकिन 

यह सुनते सुनते थक गया कि

कुछ नही होगा,कोई नही सुधरेंगे 

सब अपनी अपनी मस्ती में  है 

कोई नही सुनता किसी कि ।

यकीन नही होता कि ज्ञान 

ईतना बेअसर हो गया है कि

लोग बेअसर हो गए है ।

💙 बात बनेगी 

जब कोई बात बीगड जाए

सभाँल ना होगा खुदको 

फिर बात को एसे कि 

बात ओर न बीगडे 

तो ही बात बनेगी वरना 

बात ओर बगडती जाएगी ।

💚 निकाल दो तो

पथ्थर से बीन जरूरी निकाल दो 

तो भगवान कि मूरत बनती है ।

अगर पथ्थर दिल ईन्सान से

बीन जरूरी दुर्गुण निकाल दो

तो एक आर्दश ईन्सान बनता है ।

विनोद आनंद                                22/06/2017     फेंन्ड, फिलोसोफर,गाईड

801 दाग

जैसे दाग कपडे पे, धूल ने 

कि तुरंत कोशिश करते है 

एसा नही किया तो

कपडे पे दाग पे दाग

लगते जाएँगे और 

कपडे का रंग या

सुरत बदल जाएगी ।

एसे जिंदगी में कई 

दाग लगते रहते है 

लेकिन उसे धूल ने कि 

कोशिश नही करते और

दाग ईतने बढ जाते है

कि जिंदगी का रंग-ढंग

बदल जाता है और 

जीना मुश्केल हो जाता है ।

जब भी दुर्गुण का दाग लगे

तो तुरंत धूलने कोशिश करे 

तो निकल शकता है । हो शके

तो जिंदगी पे सद् गुणों का 

टिका लगाने का प्रयाश करना ।

जिंदगी दाग रहीत और सद् 

गुणों के टिको से चमकेगी ।

विनोद आनंद                                 05/06/2017

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686 भेद भाव

अपने लिए कुछ अलग

दूसरों के लिए कुछ अलग

नियम,नज़रिया, और सोच ।

दूसरों की बडी समस्या छोटी

अपनी छोटी समस्या बडी ।

दूसरों कि गलती, माफ नही

अपनी गलती माफ ।

दूसरों के दुर्णगु कहेना

अपने दुर्णगु छूपाना ।

दूसरों के सद् गुण न देखना

अपने सद् गुण कहेना ।
दूसरों के लिए कुछ ओर ।

अपने लिए कुछ ओर

दूसरों का व्यवहार निंदनीय, 

अपना व्यवहार सराहनीय ।

दूसरों का स्वभाव खराब, 

अपना स्वभाव अच्छा ।

दूसरे का जो भी कर्म  वो गलत, 

अपना जैसा भी कर्म  वो सही ।

दूसरो की गलतियाँ निकालना

अपनी गलती नही निकालना ।

दूसरो सब जूठ्ठे, अपना सब सच ।

दूसरों का ओर अपनो का अलग

हीसाब क्यूँ ? दूसरों के साथ 

एसा भेदभाव क्यूँ ? 

जब खत्म हो एसा भेदभाव

तब होगा परस्पर मेल जुल ।

विनोद आनंद                          05/03/2017   फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

667 सफर जिंदगी का

​सफर में जितना सामान कम

उतना सफर होगा आसान ।

कम ईच्छाओ का सामान हो तो

जिंदगी का सफर होगा आसान ।

सफर में अनुकूलता हो या, 

प्रतिकुलता,मन अपशेट न हो तो

जिंदगी का सफर कटेगा अच्छा ।

जिंदगी सफर में चिंता तनाव का

बोज हो तो सफर होगा कठीन ।

जिंदगी में निराशा,उदासीन का

मौसम हो तो सफर होगा गमगीन ।

जिंदगी में दुर्गुणो,कुटेवो का मेला

सफर जिंदगी का होगा मुश्किल।

बुरे विचारों,गलत मान्यता हो तो

जिंदगी का सफर होगा दुःखी ।

जिंदगी का सफर हो आशान और

सफल यही लक्ष्य और प्रयाश, 

बनेगा सफर आशान और सफल ।

जिंदगी का सफर हो आशान और

सफल यही शुभकामना और 

प्रार्थना मेरी ईश्र्वर को ।

विनोद आनंद                           15/02/2017   फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

658 कोहरा

​शहर में जब कोहरा छा जाए, 

तब दिन में रात नज़र आती है ।

आखोंमें रोशनी है मगर बहार, 

न उजाला न अंधेरा एसा होता है, 

कि कुछ नज़र नही आता और

वाहन व्यवहार रूक जाता है ।

जब वातावरण में कोहरा दूर हो, 

तब सब कुछ पहेले जैसा होता है ।

लेकिन जब जीवन पर निराश, 

चिंता, तनाव का कोहरा छा जाए 

तो जीवन में अंधेरा छा जाए,

मायुस हो जाए और लड़खडा जाए ।

चिंता का कोहरा,चिंतने से

तनाव का कोहरा लक्ष्य और 

आयोजन युक्त जीवन से कम 

हो शकता है तब जीवन में

सब कुछ ठीक हो जाता है ।

वरना सब कुछ गलत  होता है ।

जब जीवन पर दुर्गुणो 

और खराब आदतों का 

कोहरा छा जाए तो जीवन में

अंधेरा छा जाए,मायुस हो जाए 

और लड़खडा जाए ।

दुर्गुणो और खराब आदतों का 

कोहरा,सद् गुणो और अच्छी

आदतों से दूर हो जाता है तब 

सब कुछ ठीक हो जाता है । 

वरना सब कुछ गलत  होता है ।

विनोद आनंद                         03/01/2016 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

 

​   दुर्जन-सज्जन कैसे ? 

​सज्जन या दुर्जन है तो मानवी

जो दुर्गुणो के भरा है वो दुर्जन, 

सद् गुणो के भरा है वो सज्जन ।

सज्जन या दुर्जन है जीव आत्मा ।

आत्मा परमात्मा का अंश 

परमात्मा के सभी गुण मौजूद है

लेकिन उसे जगाकर धारण 

किया जाय तो जीव आत्मा 

सद् गुण धारण कर देगा ।

तब मानवी  सज्जन बनता है

अगर उसे नही जगाया तो 

दुर्गुण प्रभाव दिखाएगा, 

और जीव आत्मा दुर्गुण 

धारण कर देगा तब मानवी 

दुर्जन बनता है । 

सज्जन का आगमन और

दुर्जन का जाना खुशी देता है ।

सज्जन का जाना और

दुर्जन का आगमन दुःख देता है ।

सज्जन या दुर्जन संग उसे 

बदल शकता है । 

सत्संग दुर्जन को और कुसंग

सज्जन को बदल शकता है ।

कुसंग से दूर और सत्संग के

पास रहोगे तो सज्जन बनोगे ।

विनोद आनंद                        09/12/2016           फेंन्ड, फिलोसोफर,गाईड