1871 मतलबी ईन्सान कि परख

मतलब निकल गया तो पहचानते
नहि,मतलब कि दुनिया सारी यहाँ
कोई किसी का यार नहि ।
मतलबी न बनो, मतलबी को परखो ।
बातचीत,व्यवाहार,गतिविधियोंसे
उसे परखो और बचो या दूर रहो ।
कुछ निशानीयाँ से आप परखो
और सावधान हो जाओ ।
* जो कहते है वो करते नहि
* उसे जरूरत है तो हि वो
आप के साथ होते है ।
* वादें करते है, निभाते नहि
* जुठ्ठ बोलते है, स्वार्थी है
* खुद हि प्लान बनाते है और
बहाना बना के रद करते है ।
* जब आप को उन कि जरूरत
है तो वो पलायन हो जाते है ।
* दूसरों को खुश करने का ढोंग
या दिखावा करता है ।
* वो चाहते है कि सब उस कि
तारिफ करे सब कि नजरों में
बने रहे, सब उन को ध्यान दे ।
* उन के जीवन में किसी के लिए
कोई जगह नहि होती और वो
किसी के कुछ काम के नहि है ।
* वो रिश्ते का ईस्तमाल करते है
अपने फायदे के लिए ।
* रिश्ते कि कोई हेमीयत नहि होती
रिश्ते टूटना है तो टूट जाए ।
मतलबी आप के परिवार में या दोस्तो
में या ओफिस में मिलेगे । परखो, जानो
और बचो उस पर कभी विश्र्वास न करो ।
विनोद आनंद 25/01/2020
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1864 सच्चा सुख कहाँ है ?

सच्चा सुख कहाँ है ? जो सुख
चिरंजीवी हो वो सच्चा सुख है ।
दूसरों के सुख में खुस रहने में,
अपनो को खुस रखने में, सेवा
और समर्णप में सच्चा सुख है ।
सच्चाई में,संतोष में,हर हाल में
खुस रहने में सच्चा सुख है ।
निरोगी शरीर में, मानसिक
स्थिरता में,आर्थिक निर्भरता में,
और पारिवारिक प्रसन्नता में
सच्चा सुख है ।
सामाजिक प्रतिष्ठा में, गुरू में
निष्ठा और ईश्र्वर में श्रध्धा और
विश्र्वास में सच्चा सुख है ।p
सच्चा सुख पैसा, चीजों में और
सुख सगवड में नहि है ।
सिर्फ सच्चे सुख कि परिभाषा
और नजरिया बदलना है तो सच्चे
सुख का साक्षात्कार होगा और
जीते जी मुक्ति मिल जाएगी ।
सच्चे सुख कि कल्पना करो,
स्वप्ना देखो, संकल्प करो और
प्रयास से होगा स्वप्न साकार ।
विनोद आनंद 20 /01/2020
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1836 जिंदगी एक सितार

जिंदगी एक सितार जिसे में
सुरीला संगीत निकालना है,
जैसे कलाकर सितार से मधुर
संगीत निकाल शकता है ।
सितार से सुरीला संगीत तब
निकलता है जब सभी तारें
बराबर खीचें हुए हो, मतलब न
कोई तार ढीला,न ज्यादा टाईट ।
सितार के जितने तार,उतना हि
तार जिंदगी के सितार के होते है ।
जैसेके सेहद और परिवार के तार,
समाज और आध्यत्मिकता के
तार, सभी तारों को बराबर खींच
के रखने से मधुर संगीत बजेगा ।
मतलब है सभी पहेलु को न कम,
न ज्यादा लेकिन सहि समय देना
पडेगातो सभी तारोंसे सुरीला
संगीत जरूर निकलेगी, मतलब
जिंदगी सफल,सार्थक, समृद्ध
बनेगी वरना बेसुरा संगीत बजेगा
जिंदगीकि सितारसे,मतलब
जिंदगी असफल और बेकार बनेगी ।
विनोद आनंद 24/12/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1796 पहेचान

अपनो कि,रिश्तेदारो कि,दोस्तों
कि असली पहेचान अच्छे वक्त में
नहि होती, अच्छे वक्त में तो सब
मधुमखीयों कि तरह चीपकते है ।
असली पहेचान बूरी परिस्थितियों
में होती है, जो मतलबी होते है वो
छोड देते है और जो सच्चे है वो
साथ रहते है । निर्मित परिस्थितियों
में साथ रहने वाला सहि रिश्तेंदार है ।
* रोग कि दशा में साथ रहने वाला
* दुःख दर्द कि अवस्था में साथ दे ।
* गरीबी कि दशा में अपना मानने वाला
* किसी से दुश्मनी-मुश्किल के समय साथ दे ।
* महत्तवपूर्ण पारिवारिक फैसलो में साथ दे ।
* परिवार मृत्यु के दुःख में शामिल हो ।
एसी विकट/विपरीत परिस्थितियों में हि
सब कि असली पहेचान सामने आती है ।
मतलबी से रिश्ता नहि रखने चाहिए ।
रिश्तों को जिनो समझो चकासो और
फिर उसे कुछ भी किंमत पर । निभाओ ।
विनोद आनंद 19/11/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1763 संस्कार

संस्कार शुभ या अशुभ और
अच्छे या बुरे हो शकते है ।
शुभ-अच्छे संस्कार जीवन कि
वो संपदा है जो जीवन सँवारे,
वो अच्छी परवरिश से,संस्कारी
मात,पिता,परिवार से मिलता है ।
मात और पिता कि पवित्र फर्ज है,
कि वो बच्चो को अच्छे संस्कार दे ।
बच्चे का संस्कार 6 तरिके से बनते है
– आत्मा के असली संस्कार से (प्रेम,दया,करूणा,आनंद,पवित्रता,शांति)
– पूर्व जन्म के संस्कार से
– माता पिता, और परिवार से
– सोसायटी, दोस्तो, वातारण से
– व्यक्ति कि ईच्छा शक्ति से ।
– सत्संग से अच्छे संस्कार बनते है ।
संस्कारी माता पिता के संस्कार,
और ईच्छा शक्ति प्रबल तो, वातारण
के बुरे संस्कार का असर नहि होता ।
वो हि संस्कार दूसरे जन्म में पूर्व
जन्म का संस्कार बनता है ।
माता पिता कि परवरिश से बच्चो में
अच्छे संस्कार का निमार्ण होता है ।
अच्छे संस्कार हि संपदा और सुख
शांति का बीज होता है
विनोद आनंद 19/10/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1746 शेर शायरीयों का गुलदस्ता-91

🌻 वर्तमान को न बीगाडो
कल गया वो भूतकाल
उस को भूला देना,अगर
वर्तमान में जीना है तो ।
कल आएगा वो भविष्य,
उस कि चिंता वर्तमान में
करे के वर्तमान न बीगाडो ।
हसी खुसी वर्तमान में है,
जीना है वर्तमान में, उसे
भूतकाल और भविष्य के
नाम करके वर्तमान को
भूतकाल न बनाओ, वर्तमान
बीगाड के भविष्य न बीगाडो ।
🌹 दौलत
दौलत है जरूरी मगर सब कछ
नही क्यूँ कि अगर कई चीजे
दौलत खरिद शकती है तो कई
चीजे एसी भी है जो दौलत नहि
खरिद शकती है । दौलत जरूरत
से ज्यादा महत्त्व न देना । अपने
परिवार और संबंधो को ज्यादा
महत्त्व दो तो होगा जीवन सफल ।
🍁 काबिल
स्कूल, कोलेज कि कितनी भी
परीक्षा देकर अब जीने के
काबिल बन गए है, मगर क्या
जिंदगी कि परीक्षा में ऊत्तिर्ण
होकर जिंदगी को जीत पाए हो ।
जिंदगी को जीत कर जीना है
हार के नहि । वि फोर विक्टरी ।
विनोद आनंद 04/10/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1689 नासमज

नादान, नासमज, मूर्ख, अल्प
बुध्धि वो है, जो समजते नहि ।
समजना नहि चाहते, वो मद
बुध्धि है या तो है अहंकारी ।
नासमज वो है जो अज्ञानी है
या ज्ञान है फिर भी अपनी
जिद्द या मनमानी कि वज़ह से
समजना नहि चाहे ईसलिए
परिवार में मत भेद, गेर समज
होने से रिश्तें कमजोर होते है ।
घरमें क्लेश तकरार का माहोल
बन जाता है और घर नर्क बन
जाता है ईसलीए नासमज रिश्तें
टूटने का जरिया बन जाती है ।
परिवार में एक दूसरों कि बातें,
भावनाए, तकलीफे समजना है ।
अपनी जिद्द और अहंकार को
टोडना होगा नहि तो रिश्तें टूटेगें
रिश्तों के सिवा परिवार कैसा
होगा ? जीवन कैसा होगा ? सोचो
समजदारी रिश्तोंको निखारती है ।
परीवार में एक दूसरों को समजना
सहन करना, प्रेम करना, सहयोग
करना, सेवा करने कि भावना से
परिवार स्वर्ग और घर बनेगा मंदिर ।
नासमज व्यक्ति दुश्मन परिवार का
और समजदार दोस्त परिवार का ।
समजदारी एक दिव्य सदगुण ।
नासमज एक शैतान का दुर्गुण ।
समजने वाले समज गए, जो न समजे
वो अनाडी है या शैतान से कम नहि ।
विनोद आनंद 07/08/2019 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड