1660 जीने का सहि तरीका

जीवन में कोई भी कमी
होगी तो चलेगा लेकिन
थोडी सी कमी प्रेम कि
सहन नहि कर शकेगें ।
जीवन कोई भी चीज़ टूटे
मन को समझा शकते है
लेकिन अगर दिल टूटे तो
मन को नहि समझा शकेगें ।
जीवन में कुछ खो जाए तो
ढूँढ लेगे लेकिन मन खो जाए
तो मन को नहि ढूँढ शकेगें ।
जीवन मे कोई भी रूढ जाए
तो मना शकेगे मगर अपनों
को नहि मना शकेगें।
जीवन में एक दिन खाना नहि
मिले तो चलेगा लेकिन पानी
बीना एक दिन भी नहि चले ।
जीवन में जो गौण है उसे के
बीना जी शकते है लेकिन
जो जरूरी है और आवश्य है
उसे बीना जीना मुश्किल है ।
जीवन में जरूरी-आवश्य और
बीन जरूरी- बीन आवश्य कि
समझ आए तो समझलो कि
जीने का सहि तरीका आगया ।
विनोद आनंद 10/07/2019 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

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1635 ईतना तो करना प्यारे

कम खाओ, गम खाओ और
जरूरत से ज्यादा न बोलो ।
जो मिले उसे स्वीकरो और
हर पल खुस खुसाल रहो ।
ईतना तो करना प्यारे अगर
सुख शांति से जिना है तो ।
गम से न गभराना,समस्या से
न भागना और डरो से न डरना ।
अपनी भूल कबुल करके माफि
माग लेना, दूसरों कि भूल माफ
करके रिश्तों को सँवारना ।
ईतना तो करना प्यारे अगर
सुख शांति से जिना है तो ।
जैसा व्यवहार आप दूसरों से
नहि चाहते एसा व्यवहार आप
दूसरों के साथ मत करना ।
सब के प्रति सम् भाव, सद् भाव
प्रेम भाव, परोपकार भाव रखना ।
ईतना तो करना प्यारे अगर
सुख शांति से जिना है तो ।
किस कि निंदा, चाडी चुगली
न करना, दूसरों कि प्रगति में
बाधा न डालना खुस रहेना ।
जिंदगी में कम जरूरत हो,
अपनों से कोई अपेक्षा न हो ।
ईतना तो करना प्यारे अगर
सुख शांति से जिना है तो ।
जिंदगी में काम ,क्रोध, लोभ
मोह, मद, ईर्षा से बचो ।
नैतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक
जीवन जीओ ।
ईतना तो करना प्यारे अगर
सुख शांति से जिना है तो ।
विनोद आनंद 17/06/2019 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1630 एसा हि बनो

मर्यादा महानता और
अमर्यादा नीचता है,
मर्यादित जीवन जीओ ।
उदारता उत्तमता और
कंजूसाई मूर्खता है,
उदारता दिखाओ ।
समजदारी सफलता
और नासमझ निष्फलता
समजदार बनो ।
नम्रता ईन्सानीयत और
क्रूरता शैतानीयत है,
नम्र बनो ।
उत्साह उन्नति और
निराशा अधोगति है ,
जीवन में उत्साही बनो
समाधान समाधि और
असमाधान लडाई,
समाधान पर ध्यान दो ।
प्रेम परमात्मा है और
नफरत दुश्मन है ।
परमात्मा को प्रेम करो ।
हिंमत साहस है
कमजोरी निर्बलता है
हिंमतवान बनो ।
सहिष्णुता संबंध का
रखवाल संबंधी है,
असहिष्णुता संबंध
तोडने वाल वैरी है ।
सहनशीली बनो ।
सदगुणो सुंदरता और
दुर्गणो कुरूपता है
सदगुणो बनो ।
अच्छी आदतें अच्छा
जीवन और बुरी आदतें
बदनाम जीवन ।
अच्छा जीवन सुख
शांति, बदनाम जीवन
दु:खी, अशांत जीवन ।
भक्ति हि मुक्ति और
भोग हि है बंधन,
भक्त बनो भोगी नहि ।
विनोद आनंद 14/06/2019 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1615 किंमत चुकानी पडेगी ।

हर चीज़ मूल्यवान है
जिसे पाने के लिए उस
कि किंमत चुकानी पडेगी ।
कोई चीज़ एसे हि नहि
मील जाती है । उसे के
बदलेमें पैसा, प्रेम और
महेनत करनी होगी ।
किंमत उस के मूल्यसे
ज्यादा चुकानी होगी ।
मुफ्तमें पाने कि चेष्ठा
या कोशिश नहि करना ।
अगर सहि वक्त पे मौका
देख कर काम करोगे तो
शायद किंमत कम होगी ।
जिंदगी में सहि तरीके से
खुद कि और दूसरों का
सहि मूल्यांकण करना ।
चोरी, लूट और धोके से
पाई हुई चीज कि किंमत
भी एक दिन चुकानी होगी ।
जिंदगी में किस्मत भी किए
हुए कर्मो कि किंमत है ।
विनोद आनंद 30/05/2019 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1611 प्रेम बंधन या मुक्ति

प्रेम बंधन या मुक्ति ?
प्रेम परमेश्र्वर और आत्मा
का असली स्वभाव ।
जो प्रेम हम समजते है
जिस में सिर्फ कुछ पाने कि
ईच्छा, कुछ लेने कि अपेक्षा,
वो प्रेम बंधन है मुक्ति नहि ।
प्रेम करते है प्रेम पाने को तो
वो प्रेम है बंधन, मुक्ती नहि ।
जिस प्रेम में पदार्थ प्रति या
व्यक्ति के प्रति हो आसक्ति वो
प्रेम बंधन है मुक्ति नहि ।
जिस प्रेम में सिर्फ देना हि
देना है, कोई अपेक्षा नहि,
और आसक्ति नहि वो प्रेम
बंधन नहि मुक्ति है ।
न कोई स्वार्थ और न कोई
शर्त तो वो प्रेम है मुक्ति ।
जहाँ स्वार्थ और शर्त होती है
वो प्रेम बंधन का कराण है ।
प्रेम को सिर्फ प्रेम करने में हि
अदभूत आनंद आता है ।
किसे के साथ संबंध है उसे
प्रेम करना हि पडता है वो
प्रेम मुक्ति नहि, बंधन है ।
जहाँ अपेक्षा, स्वार्थ और
पाना है वो प्रेम साधना नहि
प्रेम कुछ पाने का साधन है ।
विनोद आनंद 27/05/2019 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1608 कौन शत्रु ? कौन दोस्त

दुनिया में, समाज में या घर में
कौन तुम्हारा शत्रु, कौन दोस्त ?
है पहेचानना है मुश्किल ? क्यूँ कि
तुम्हारा कोई ओर शत्रु या दोस्त
नहि है, आप खुद हि आप का
शत्रु या दोस्त हो और दूसरों को
अपना शत्रु या दोस्त मानते हो ।
आप सही तरीके से जिंदगी जीते
हो तो आप अपने हि दोस्त है ।
आप गलत तरीके जिंदगी जीते है,
तो आप हि खुद के बडे शत्रु हो ।
कोई तुम्हारा दुश्मन या दोस्त
नहि हो शकता । ईसलिए अपना
ध्यान दूसरों से हटाकर खुद पे
लगाओ और आप खुद को अपना
दोस्त बनाने का प्रयास करो ।
अगर आप खुद पर नियंत्रण करना
शीखकर और अपने आपको सुधार
कर सहि जिंदगी जीओगे तो आप
अपना दोस्त बन शकते हो ।
फिर तुम्हे को शत्रु का डर नहि है ।
दोस्त सुख शांति देता है या जो
सुख शांति दे वो तुम्हारा दोस्त ।
आप के षढ् रिपु है,काम, क्रोध,
लोभ, मोह, मद, ईर्षा उसे बचना ।
आपके षढ् दोस्त है शांति,प्रेम,दया
करूणा, ज्ञान, और आनंद है आत्मा
के सद् गुण उसे धारण करना ।
तुम खुद अपने दोस्त बनो शत्रु नहि ।
विनोद आनंद 24/05/2019 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1601 रिश्तें टूटते क्यूँ ?

जो टूट जाए वो रिश्ते नहि,जो
रिश्ते तोडे वो ईन्सान नहि ।
रिश्ते ईन्सान बनाता है अगर
वो हि रिश्ते तोडात है तो उसे
रिश्तों कि हेमीयत या रिश्तों
कि ताकात नहि पता है ।
वो रिश्तें का सिर्फ ईस्तमाल,
करता है निभाना नहि है ।
रिश्तें निभाने से टूटते नहि ।
रिश्तें में जिम्मेदारी होती है
न निभाने से रिश्ते टूटते है ।
रिश्तों में प्रेम होना जरूरी है,
प्रेम बीना रिश्तें टूटने लगते है ।
रिश्ते समर्पण से सँवरते है
स्वार्थ से रिश्तें टूटते है ।
मान सन्मान और मर्यादा
के अभाव से रिश्तें टूटते है ।
समझ से और सहन करने से
रिश्तें टिकटे है वरना टूटते है ।
क्रोध,लोभ,मद और ईर्षा रिश्तें
के जानी दुश्मन टोडते है रिश्ते ।
रिश्तें जीवन कि जडीबुट्टी बने
जीवन स्वस्थ,सफल सार्थक ।
रिश्तों को अग्रता देने से, हेमीयत
देने से, निभाने से और सँवारने से
रिश्तें टूटते नहि, मजबूत होते है ।
हम अपने हक पर ध्यान देते,
अपनी जिम्मेदारी पर ध्यान नहि
देते ईसलिए रिश्ते टूटते है ।
विनोद आनंद 18/05/2019 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड