2106 ध्यान समाधि और साधना

ध्यान एक बहेतरीन साधना ।
ध्यान एक भीतर कि यात्रा ।
जीवन परिवर्तन कि प्रक्रिया ।
ध्यान कि भूमिका है शुध्ध
और स्थिर अतः करण ।
ध्यान आत्मा का परमात्मा
तादतम्य पाने का, मन पर
नियंत्रण,एकाग्रता, आत्मा
का उध्धार और शांति पाने
उत्तम प्रयास है ।
जैसे साकार जळ रूप हो
एसे ध्यान से मन आत्मा
में विलीन हो जाता है तब
वो समाधि बन जाती है ।
ध्यान का लक्ष्य है समाधि ।
निर्विचार ध्यान साधना का
परम लक्ष्य होता है ।
निर्विचार ध्यान मन और
आत्मा कि एकता है समाधि ।
समाधि ध्यान कि परम
अंतिम अवस्था है, जिस में
आत्मा बह्मरूप बनता है ।
विनोद आनंद 19/07/2020
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2104 सुनी कही बातें-8

🌹 माँ पिता का रिश्ता
माँ सोचती है कि बेटा
आज भूखा न रहे और
पिता सोचता है कि बेटा
कल भूखा न रहे ।
संसार में बस यही दो
रिश्ते है कि जिसे दूसरा
कोई भी रिश्ता बराबरी
नही कर शकता ।
ईसलिए संसार में धरती
पर कहि भगवान है तोत
वो मा बाप के रूप में है ।
🌻 मन
मन में विश्वास और ईश्र्वर
में श्रध्धा रखकर कोई भी
हार नहि शकता।
मन में शंका और ईश्र्वर
में अश्रध्धा रखकर कोई
जीत नहि शकता ।
महेनत करने वाले के हार
नहि हो शकती ।
🍁 चोट
पत्थर से और गैरों से लगी
चोट कुछ दिन में ठीक हो
जाती है मगर किसी अपनों
के कटु शब्दो और धोखे से
लगी चोट ठीक नही हो
शकती और आदमी अंदर
से पथ्थर बन जाता है ।
विनोद आनंद 17/07/2020
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

2072 अंध विश्र्वास न करे

ध्यान कहाँ नज़रें कहाँ,
मन कहाँ, दिल कहाँ,
ईरादें कहाँ, वादे कहाँ,
बातें कहाँ, काम कहाँ
कहते कुछ ओर, करते
कुछ ओर । दिखते कुछ
ओर दिखाते है कुछ ओर ।
आँखो में आंशू भीतर में
कुछ आग, होठों पर
हसी दिल में बदला ।
हाथी के दांत दिखाने,
और चबाने के अलग ।
चहरे पे चहेरा कौन सा
असली कौन सा नकली ?
मन वचन और कर्म सभी
अलग अलग कैसे करे
किसी का भी विश्र्वास ?
बस हर वक्त सावधान,
जागृत, सतर्क रहेना है,
हर बात का निरीक्षण
करे, हर बात को तुरंत
न माने और न स्वीकारे,
फिर भी विश्र्वास करे तो
भी निश्चित हो कर अंध
विश्र्वास न करे ।
विनोद आनंद 23/06/2020
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2067 फिल्मे मनोरंजन या मनो विकार-2

फिल्मे मनोरंजन-मनो विकार-1 से आगे
एसे हालात में युवान युवतियों को
जवानी के जोस के साथ थोडा होस में
या जागृत होकर उत्तेजीत फिल्मों से दूर
रहकर कलात्मक फिल्मों को देख कर
मनो विकार से बचे और अपने चारित्र
और केरीयर घडतर पर ध्यान दे तो एसी
उत्तेजीत फिल्में फोल्प हो और कलात्मक,
चारित्र घडतर कर शके एसी फिल्में बनने
कि शरूआत हो ।
नव युवान के चारित्र, देश के भविष्य कि
जिम्मेदार मिडीया,फिल्मों पे आधारित है
क्यूँकि वो घर घर पहोचकर असरदार
माध्याम बन गया है, जिसे नव युवान
युवतियों प्रभावित होकर, अनुशरण
और अनुकरण करने लगते है ।
प्रशासन या सेन्सर बोर्ड को भी एसे
दश्य कटकरने का अघिकार है जो
देशके युवा युवतियों को उत्तेजीत
और बरबाद करदें और दोनों के
भविष्य से खिलवाड़ करे ।

विनोद आनंद 20/06/2020
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड