1891 ज़हरीले वाक्य

माता पिता कि बच्चों का पोषण
और संस्कार देने कि पवित्र
जिम्मेदारी है, जिस से स्वस्थ,
आदर्श व्यक्ति का निर्माण हो ।
मात पिता संस्कारी और शिक्षीत हो ।
उन के जिवन का लक्ष्य आदर्श
व्यक्ति का निर्माण करने का हो ।
बच्चे में अच्छी आदतें और अच्छे
स्वभाव का सिंचन करना होगा ।
उस के साथ व्यवहार करते वक्त
ज़हरीले वाक्यों का प्रयोग न हो ।
क्यूकि, उस के नाजुक दिमाग में
यह ज़हर बैठ जाता है और बच्चा
लघुग्रंथी का शिकार हो जाता है
आत्म विश्र्वास खो देता है और
वो कमजोर हो जाता है ।
* ध्यान रखो कि गलत और बूरे
शब्दो का ईस्तमाल न करो ।
* उस के वर्तन या कार्य में खामी,
न बताना और न टोकना, जैसे कि
तुम बुध्धु हो तुम्हे अक्ल नहि है ।
बल्कि उसे सुधारना ।
* तुने हमारे यहाँ क्यू जन्म लिये
तुम हमारे पर बोज हो ।
* दूसरों से तुलना करके उस के
स्वमान को ठेस न पहोंचाओ
* तुम्हारी बात मनवाने के लिए
डरना या कुछ काम के लिए
फोल्स वचन देना ठीक नहि ।
* आप बात नहि सुनोगे तो में चली
जाऊगी, तुम्हे होस्टेल में भेज देंगे
* तु एसा करोगे तो फैल हो जाएगा,
नहि पढ पाओगे न बढ पाओगे ।
पांच साल तक सावधान, बच्चो से
गुस्से में चिल्ला के व्यवहार न करे ।
धीरज से और शांति से बच्चो को
समजा फुसला कर काम ले ।
विनोद आनंद 11/02/2020
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1841 स्वर्ग-नर्क कहाँ

स्वर्ग-नर्क सिर्फ मरने के बाद
हि नहि, जीतेजी भी स्वर्ग नर्क
का अहेसास होता है ।आप
स्वर्ग में जीते है या नर्क में ?
आप दुःखी-निराश हो तो
आप नर्क में जीते हो ।
आप खुश-आनंदित हो तो
आप स्वर्ग में जीते हो ।
आप नफरत-ईर्षा में जीते हो
तो आप नर्क में जीते हो ।
आप प्रेम-करूणा में जीते हो
तो आप स्वर्ग में जीते हो ।
आप लोभ-लालच में जीते हो
तो आप नर्क में जीते हो ।
आप संतोष में जीते हो तो
आप स्वर्ग में जीते हो ।
आप स्वार्थ के नसे में जीते
हो तोआप नर्क में जीते हो ।
आप निःस्वार्थ जीते हो तो
आप स्वर्ग में जीते हो ।
आप राग द्रेष में जीते हो तो
आप नर्क में जीते हो ।
आप अनासक्त भाव में जीते
हो तो आप स्वर्ग में जीते हो ।
आप झगडे झगडे जीते हो
तो आप नर्क में जीते हो ।
आप शांति-समाधान में जीते
हो तो आप स्वर्ग में जीते हो ।
आप एसो आराम में जीत हो
तो आप नर्क में जीते हो ।
आप कर्मयोगी बनके जीते
हो तो आप स्वर्ग में जीते हो ।
आप दुर्गुणों के साथ जीत हो
तो आप नर्क में जीते हो ।
आप सदगुणों के साथ जीते
हो, तो आप स्वर्ग में जीते हो ।
स्वर्ग यहाँ नर्क यहाँ उस के
सिवा जाना कहा, तुम चाहो
एसा जीवन बना शकता हो ।
स्वर्ग हि यहाँ है,नर्क हि यहाँ है ।
विनोद आनंद 31/12/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1830 लोग क्या कहेंगे ?

तुम वो नहि हो जो लोग
कहते है तुम वो हो जो
तुम कहेते हो । लोगो कि
बातों को मन पर न लेना ।
लोग कुछ भी कहै,लोगो का
काम है नूक्स निकालना ।
तुम को सहि लगे वो करना
लोगो कि बातों से नाराज न
होना वो उस के संस्कार है
द्रष्टिकोण है, और मत है,
वो सच नहि हो शकता ।
तुम्हे जो सच लगे उस का
हि स्वीकार करो, नहि तो
अस्वीकार करो, शांत रहो
आवेश या गुस्सा न करो ।
लोग क्या कहेंगे”जैसे रोग से
बचोगे तो,सफलता मिलेगी ।
लोगों कि बातें सुनसुन के
कान पक जाएंगे, लोगो कि
बातों में कितना दम है वो
महेसूश करो फिर गोर करो,
बकवास समझके भूल जाओ,
मुड न बीगाडो और खुस रहो ।
विनोद आनंद 20/12/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1771 गीफ्ट जिंदगी को दो

कभी आपने अपने आप
को कोई गीफ्ट दिया है ।
जिंदगी ईश्र्वर कि गीफ्ट है ।
हमे जिंदगी को सुख शाति,
आनंद और अच्छे स्वास्थ
कि गीफ्ट देनी पडेगी ।
जिंदगी तुम्हारे कर्मो कि
रीर्टन गीफ्ट है । जिंदगी को
10 आसान गीफ्ट देना है ।
* करसत या चलने कि आदत से
अच्छे आरोग्य कि गीफ्ट ।
* दिन में अच्छे हेल्थी ब्रेकफास्ट,
लंच,और डीनर नियत समय से
अच्छे स्वास्थ कि गीफ्ट ।
* शरीर को दिन भर पानी कि
आवश्यकता है जब प्यास लगे
पानी पी लिजीए आलस न करो ।
पानी बैठ के पीना ।
* काम के बीच 15 मिनिट मन
पसंद गाना या गप्पे लडाओ जिसे
मन खुस और फ्रेश हो जाए ।
* किसी भी बात कि अति न करे
क्यूँकि अति सर्वत्र व्रजेत ।
* सकारात्मक सोच और बातों
का किंमती गीफ्ट दो जिंदगी को ।
* निरधारित समय पे 6 से 7 घंटे
कि निंद लेना, न कम न ज्यादा ।
* ईश्र्वर कि प्रार्थना और पूजा
श्रध्धा और विश्र्वास से करे ।
* ध्यान, प्राणायाम, मेडीटेसन
को भी समय देना ।
नये साल में यह सब 10 गीफ्ट
जिंदगी को दोगे तो तन, मन
स्वस्थ रहेगा, तो सुख, शांति,
और नया जीवन पाओगे ।
विनोद आनंद 26/10/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1716 असली स्वभाव

मनुष्य का असली स्वभाव
क्या है ? जानना जरूरी है ।
आत्मा का स्वभाव हि मनुष्य
का असली स्वभाव होना है ।
लेकिन वो कुछ ओर होता है ।
आत्मा का स्वभाव है प्रेम, तो
मनुष्य का स्वभाव प्रेम हि है ।
मगर द्वेष, ईर्षा और नफरत में
तबदिल हो गया है ।
आत्मा का स्वभाव है शांति तो,
मनुष्य का स्वभाव हि है शांति ।
मनुष्य गुस्सा करेके अशांत है ।
आत्मा का स्वभाव है पवित्रता
तो मनुष्य का दिल साफ और
मन पवित्र होना चाहिए, मगर
मन मैला दिल भावना हिन है ।
आत्मा का स्वभाव है दयालु,
तो मनुष्य का स्वभाव दयालु है
मगर कठोर और दयाहिन है ।
आत्मा का स्वभाव है आनंद,तो
मनुष्य का स्वभाव भी आनंद है,
मगर मनुष्य, दुःखी, उदास और
निराश रहेता है ।
आत्मा ज्ञानी और शक्तिशाली है
मगर मनुष्य अज्ञानी, कमजोर है
क्यूँकि स्वभाव बदल गया है,
और ज्ञान और शक्ति का सहि
उपयोग नहि करता ।
हमे अपना असली स्वभाव प्राप्त
करके धरती को स्वर्ग बनाना है ।
विनोद आनंद 04/09/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1698 गुस्सा का विज्ञान-2

गुस्सा खुद को, दूसरे को
सुधारने के लिए, अन्याय के
खिलाफ, किसी के कल्याण
कि खातिर करना चाहिए ।
यह गुस्से का सकारात्मक
पहेलु है । एक ओर पहेलू
है कि अगर कोई आपका
किसी कारण से अपमान
करे तो उस के बदले में
तुरंत गुस्सा नहि करके वो
गुस्से को जिंदा रखके जिस
वज़ह से अपमान किया है
उस वज़ह को हि दूर कर
के मुह तोड जवाब देना है ।
गुस्से का नकारात्मक ढंग
से बढावा नहि देना है, जो
किसी के लिए अच्छा नहि ।
कोई गुस्सा करे तो आप
खुद पे नियंत्रण करके चुप
रहे और उस के प्रति क्षमा
का भाव प्रगट करे तो उस
का गुस्सा शांत हो जाएगा ।
किसी भी वज़ह से अगर
गुस्सा करना है तो होश
में रह कर गुस्सा करो,
लेकिन उस का रेगुलेटर
आप के पास रखो और
बात बढने से पहेले गुस्से
को शांत करना जरूरी है ।
गुस्से तन और मन पर भी
बहुत बुरा अशर होता है ।
संबंध बिगते है और संबंध
बिगडने से जीवन बिगडता है ।
गुस्सा वो ज्वालामूखी है,जो
सब कुछ जला के राख कर
देता है जिंदा रहते है मगर
जिंदगी छिन लेता है । अगर
आप उस के शिकार है तो
आप शिकारी बन के उस
का शिकार करके जीवन
को सुख शांति से भर दो ।
विनोद आनंद 16/08/2019 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1492 अशांति क्यूँ

एक पल कि शांति स्वर्ग
सुख कि अनुभूति ।
एक पल कि अशांति नर्क
के दु:ख कि अनुभूति ।
हम चाहते हुए भी एक
पल शांत नहि रह शकते ।
जैसे रोग निवारण सही
कारण से होता है एसे
अशांति का निवारण सही
कारणो हो शकता है ।
अशांति के करण कई है
जैसे अपनी अमर्यादित
कमनाए, वासनए,उमीदे
ईच्छाए या महत्व काँक्षाए ।
जैसे कि हमारी गलत,आदतें
भावनाएँ, स्वभाव,मान्यताएँ
और दरेक बाबतो में अति ।
जिसे हमे तकलीफे,मुश्किले
परेशानी और अशांति होती
है उसे दूर या कम करनेसे
शांति का माहोल बनता है ।
दूसरा कारणा हमारी जरूरत
से ज्यादा माहिती, शौख और
फेसन जिसे हम संस्कृति से
विकृति कि ओर जल्द आगे
बढते रहते है ।
हमारे भीतर शांति का बीज,
शांत स्वरूप आत्मा है बस हमे
उस पर फोकस करके शांति
बीज को अंकूरित करना है ।
जो चीज़े अशांति के पौधे
उगाडे है उसे जड से उखाड
के फेक देने है ।
विनोद आनंद 11/02/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड