1620 मन पर संयम

मन मनमानी करता है
लेकिन तुम अपनी मरजी
अनुसार कब करोगे, तुम
मन के अनुसार कब तक
गुलाम बन के जीओगे ?
मन कब तक नचाएगे, तुम
मन को कब नचाओगे ।
मन न ज्ञान, न बुध्धि को
पूछता है क्या सहि है या
क्या गलत ? सिर्फ अपनी
ईच्छा और मरजी अनुसार
आप पर हकूमत करता है ।
कब तक आप मन कि बातें
सुनते रहेंगे, तुम कब उस
पर हकुमत करोगे ।
अब बहुत हो गया, अब तो
मन को समजाना है या उस कि
हर बात को अनसुनी करना है ।
जो वो कहे वो तुरंत बालक
कि भाँति नहि करना, सोचना
समजना कि क्या सहि है क्या
गलत, फिर जो ज्ञान-बुध्धि के
अनुसार जो सहि है वो मानो,
जो गलत है वो न मानो,न करो ।
धीरे धीरे हकुमत बदल जाएगी
आप राजा बनोगे, मन गुलाम ।
सहि तरिका है मन पर संयम
पाकर सफलता पाने का ।
मन पर संयम विकास, मन कि
मनमानी विनास का रास्ता है ।
विकास जिंदगी का ध्येय हो, मन
पर संयम हो तो ध्येय पूर्ण होगा ।
विनोद आनंद 04/06/2019 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

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1581 मनोविज्ञान-2

मनोविज्ञान-1 के अनुसंधान में ।
मन कैसा है, कैसा होना है ?
मन कि शक्ति अपार, सहि
दिशा में लगाओ तो जीवन में
होगा विकास वरना विनाश ।
* मन अधोगामी है उसे उर्ध्वगामी
बनाओ तो विकास वरना विनास ।
* मन अति चंचल या अस्थिर है उसे
एकाग्रह या स्थिर बनाना है ।
* मन अशुध्ध और अपवित्र है
उसे सदगुणों से शुध्ध और
पवित्र बनाना है ।
* मन आलसी और भोगविलाशी है,
कर्मयोगी या क्रियाशील बनाना है ।
* मन तुम्हारा दुश्मन बन बैठा है,
मन को दोस्त बनाना है ।
* मन असंयमी और ईन्द्रियो का
गुलाम है उसे बुध्धि के साथ
जोड कर संयमी बनाना है ।
* संयमी मन अच्छा नौकर है ।
असंयमी मन बेवफा राजा है ।
* मन कामचोर और हरामी है,
लगातार काम दिया करो क्यूँ कि
खाली मन दैत्यो का अखाडा है ।
* मन हि बंधन का कारण है, मन हि
मुक्ति का जरीया है । मन कि हारे,
हार या मन का जीते जित ।
मन का असर तन पे और तन
का असर मन पे पडता रहेता है,
ईसलिए मन हमेंशा खुस या
प्रसन्न तो, तन भी रहे स्वस्थ ।
तन स्वस्थ तो मन भी स्वस्थ ।
मन कि सच्चाई जानो, मन को
गुलाम बनाओ वरना आपको वो
गुलाम बनाके छोडेगा ।
विनोद आनंद 28/04/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1565 जिंदगी कि जीत

दिल है कि मानता हि नहि
मन है कि सुनता हि नहि
ईन्द्रिया है कि छोडती हि नहि
न जाने ज्ञान कहा छूप गया है
और बुध्धि कहाँ चलती गई ।
करे तो क्या करे जिवन सहि
चलता हि नहि ?
बस सहि सोच कि जरूरी है ।
ज्ञान को जगा के बुध्धि से
आत्मविश्र्वास से दिल-दिमाग
ईन्द्रयों को वश में करना है ।
नहि है यह ईतना आसान
फिर भी थान लो तो नहि है
ईतना मुश्केल, अभ्यास से ।
दिल-दिमाग, ईन्द्रयों पर संयम
से सहि जीवन जी शकते हो ।
प्रयास करलो, कोशिश करलो
कोशिश करने वाले हारते नहि ।
दिल मान जाएगा, मन तुम्हारी
बाते मानेगा, ईन्द्रियों से दाम
छूडा पाओगे, आत्म जागेगा ।
यहि श्रेष्ठ जीत है जिंदगी कि ।
विनोद आनंद 12/04/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1453 संयम

संयम है एक साधना,
जीवन करे नियंत्रित ।
संयम से शरीर और
मस्तिक रहे स्वस्थ ।
संयम से विकास हो
और सुख शांति मिले ।
संयम जरूरी जिवन में
बीना संयम सफलता
रहेती है कोसो दूर ।
संयम सहित जीना हि
सही तरीका जीनेका ।
आहार संयम है पहेला
रहे शरीर स्वस्थ सदा ।
दूसरा संयम वाणी का
मीठी,मधुर वाणी से रहे
संबंध स्वस्थ और हो
जाए निर्माण स्वर्ग का ।
तिसरा है ईन्द्रिय संयम
हो ईन्द्रियो का निग्रह ।
चोथा है मन पर संयम
मन कि मनमानी हो कम ।
आत्म शक्ति से सभी पर
संयम वो है आत्म संयम,
जिसे हो जीवन सरल
और आत्म का कल्याण ।
मानव जीवन,संयमी और
जानवर जीवन असंयमी ।
विनोद आनंद 06/01/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1416 गुस्से से छूटकारा कैसा ?

पहेले गुस्सा तुम्हे पकडता है
न छोडा तो, जकड के रखता है ।
फिर कैसे पीछा छूडाए उस पर
ध्यान दो, उपाय सोचो, छोडो ।
गुस्सा अब स्वभाव बन गया है ।
स्वभाव शांत हो जाए तो गुस्सा
वाला स्वभाव बदल शकते है ।
उस के लिए हमारी एक मान्यता है
कि दूसरा मुझे गुस्सा दिलाता है,
उसने मेरा अपमान किया और
गुस्सा करने को मजबूर किया ।
गुस्सा करना के न करना वो तो
हमारी है पसंद, हमे यह मान्यता
बदले कि, अपने गुस्से का सिर्फ
हम हि जिम्मेदार है, क्यू कि वो
हमारी पसंद है वो बदल कर
कुछ सही तरीके से प्रति क्रिया
करे, गुस्से से नहि, सोचो और
प्रयास करो तो गुस्से पर काबू
पा शकते हो ।
गुस्सा कब करना है और कब
नही करना, किस पे करना है
या किस पे नही करना है उस
पर सोच कर बेवजह गुस्सा
करना छोड शकते है ।
थोडी जागृतता,मन-ईन्द्रियो
पर संयम रखना जरूरी है,
प्रयास द्दढता और अभ्यास से
गुस्से से छूटकारा पा शकते हो ।
विनोद आनंद 06/12/2018
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1239 मन पर संयम कैसे करे ?

मन क्या है ? उस का काम क्या ?
वो जानना है और उस पर नज़र
रखकर उसे नियंत्रित करना है ।
मन को ईन्द्रियों पर काबू रखना है ।
मन ईन्द्रियों के ईशारों को मानता है ।
ईन्द्रियों कि हर एक ईच्छा को बुध्धि
और ज्ञान से चकासना है कि वो
सही है या नही फिर ईन्द्रियों कि
ईच्छा को पूर्ण करना वरना नहि ।
यही तरिका है मन पर संयम पानेका ।
मन को मनमानी न करने दो और मन
को ना कहेने का अभ्यास करना है ।
अगर यहि तरिका और अभ्यास का
सिल सिला चलता रहा तो एक दिन
जरूर मन पर संयम पा शकोगे ।
गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि
अभ्यास और वैराग्य से मन पर
काबू पा शकते हो, धीरज से और
सतत प्रयाश करने से मन पर
संयम पा शकते हो ।
जरूरी है सिर्फती व्र ईच्छा,
द्रढ निश्चिय और कोशिश ।
विनोद आनंद 19/07/2018
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1238 मन क्या है ?

मन सूक्ष्म शरीर का हिस्सा
ज्ञानेन्द्रियो, कर्मेन्द्रियो से
पर और स्थूल शरीर का
नियंत्रक, मन से पर है
बुध्धि जो निर्णयाक और
मन का सलाहकार ।
बुध्धि का सब से अच्छा
दोस्त है ज्ञान जो बुध्ध को
निर्णय लेने में सहायक है ।
सब से पर-सुपर है आत्मा
ज्ञान और शक्ति स्वरूप
शरीर कि चेतना जो न
हो तो शरीर लाश है ।
मन को बुध्धि से, ज्ञान से
आत्म शक्ति से ईन्द्रियों
पर हकूमत करनी है तो
मन है तुम्हार दोस्त ।
अगर मन बुध्धि, ज्ञान
अनुशार नही लेकिन
ईन्द्रियों को अनुशार
काम करता है तो मन
तुम्हार बनेगा दुश्मन ।
मन का बुध्धि से लग्न
और ज्ञान से दोस्ती हो
तो मन को ईन्द्रियों से
छुडाना है तो मन कि
शक्ति का सही उपयोग
होगा और मन आप को
महान बना शकता है ।
यही है मन और ईन्द्रियों
पर संयम पाने कि प्रक्रिया ।
विनोद आनंद 19/07/2018
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड