1944 शुध्धिकरण

जीवन में जीने कि साधना हो,
या सफल होने कि साधना हो
या आध्यात्मिक साधना हो ।
शुध्धि करण बीना सफलता
या सिध्धि प्राप्त नहि होती ।
तीन प्रकार कि शुध्धियाँ है ।
पहेली शुध्धि है शरीर शुध्धि
शरीर साधन है साधना का ।
शरीर में कई गलत उलझनें
या ग्रंथियाँ पड जाती है ।
क्रोध, ईर्षा, धृणा से शरीर के
किसी अंग में ग्रंथि बनती है ।
उन का सकारात्मता तरीके
से प्रयोग से ग्रंथि नहि बनती ।
दूसरी शुध्धि है विचारों कि ।
शुभ या अशुभ विचार मन को
प्रभावीत करे है तो एसा हि
व्यक्तित्व का निर्मण होता है ।
सत्यम् शीवम् सुंदरम् का
चिंतनसे विचार शुध्धि होती है ।
तीसरी शुध्धि है भाव शुध्धि
आदमी विचारों से ज्यादा
भाव से जीता है । मन में
मैत्री, करूणा प्रसन्नता और
कृतज्ञता भाव जगाना है ।
सत्संग, प्रकृति के सानिध्य से
मन में यह भाव जग शकते है
जीवन कि साधना में सफलता
के लिए तीनों शुध्धि जरूरी है
जिस से जीवन दिव्य बनता है ।
विनोद आनंद 01/04/2020
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1953 विचारों से मुक्ति क्यूँ ?

विचारों से मुक्ति क्यूँ चाहिए ?
विचार तो जिंदगी का बीज है ।
अगर विचार से मुक्ति तो क्या
बोओगे और क्या पाओगे ।
विचार तो आएगे और जाएंगे
उसे हमे देखना है उस के प्रति
जागृत होना है, समजना है ।
उसे तादात्म्य या लगाव नहि
रखना, आप और विचार दोनों
भिन्न हो और उसे तुम साक्षी
से देखो उसे तालूकात न रखो,
विअच्छााऋरों के भँवर में न फसो ।
तुम्हे तुम्हारे विचारो का द्रष्टा
बनना है, उसे अलग रहो और
निरीक्षक बनकर तपासो कि
सकारात्म है या नकारात्मक,
भूतकाल के है या भविष्य कि
चिंता का है ,अधोगामी है या
उर्धवगाम, विकास के है या
विनाश के,कामके है या बेकार ।
अच्छे विचारों को मन में
बोना, सफलता तक पोषो ।
बाकि के सभी विचार को मन
में गाड दो, जो फिर न आए ।
कभी ध्यान में विचार शून्य
बनना है तो मन के मौन का
अभ्यास से विचारों से मुक्त
हो शकते हो वरना विचार से
लडो मत उसे देखो समजो फिर
जीने का अभ्यास करो ।
विनोद आनंद 31/03/2020
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1941 शब्दों से सफलता

सफलता सें कामीयाबी
का एहेसास होता है ।
कामीयाबी से जिंदगी
बहेतरीन बनती है ।
शब्दों में शक्ति है उस का
अशर होता है अगर आप
उसे प्रभावीत हो और दिल
दिमाग में उतर जाए ।
फिर दिल दिमाग हि आप को
सफलता दिला एगा वरना वो
कमाल नहि दिखाए पाएगा ।
शब्दो का असर होता है चाहे
वो सकारात्म या नकारात्म ।
नकारात्म शब्द अधोगति और
सकारात्म ऊर्धव गति देते है ।
जीवन में सकारात्म शब्दो का
ईस्तमाल करने कि आदत हो
तो शब्दों से सफलता मिलेगी ।
लेकिन उसे के लिए जागृत रहे
और ईस्तमाल करने से पहेल
कुछ क्षण सोच कर सकारात्मक
शब्दों का हि प्रयोग करे और
सफलता के अधिकारी बने,
वरना सफलता नहि मिलेगी ।
विनोद आनंद 24/03/2020
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1921 बातचीत कैसे करे ?

जीवन में बातचीत का
बहुत ज्यादा महत्व है ।
परिवार में बातचीत से
संबंध बीगडते है और
सँवरते भी है ।
समाज में बातचीत से
दोस्त बनते है या दोस्त
दुश्मन भी बनते है ।
व्यपार बातचीत से
बढता है या बिगते भी है ।
बातचीत करने कि कला
हि जीवन के हर क्षेत्र में
सफलता दिलाती है ।
बोलते वक्त सकारात्मक
शब्दो का ईस्तमाल करे
आवाज मध्यम रखे और
मीठी बाणी में बात करे ।
चहरे पे हसी बातचीत में
चार चाँद लगा देती है ।
बातचीत में किसी का
अपमान या निंदा न हो ।
सामने वाले का मूड, ईच्छा
या लागणी के अनुरूप
बात करना आवश्यक है ।
बातचीत में परिस्थिति या
समय का भी ख्याल रखें ।
बातचीत वक्त दूसरों का
रीएकसन भी देखना है ।
आत्मविश्र्वास से बात करे ।
बातचीत दरम्यान सिर्फ
अपनी बातें न करे दूसरों कि
बात भी अच्छी तरह से सूने ।
बातचीत कि कला से संबंध
मजबूत बने,अच्छे दोस्त बने
और व्यापार बढे तो जीवन
बने सफल और सार्थक ।
विनोद आनंद 10/03/2020
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1911 अकेलापन

बहार कितनी भीड अपनों कि,
दोस्तों कि, जान पहेचानवालों
कि,भीतर कितने अकेलापन है ।
सब साथ होते है,साथी कोई नहि ।
आसपास कितने होते है दिल के
पास कोई नहि होते है ।
कितने रिश्ते, दोस्त है मगर किसी
को अपना कह शके एसा कोई नहि ।
ईतना सब कुछ होते हुए हर ईन्सान
अकेलापन क्यूँ महेसूस करता है ?
भीतर के अकेलेपन तुम्हारे सिवा
ओर कोई दूर नहि कर शकता ।
उस के लिए खुद से कनेक्ट होना
होंगा, खुद को समझना होगा,खुद
को स्वीकार करना होगा, खुद से
बात करने का समय देना होगा ।
खुद से तीन सवाल करना होगा ।
1) क्या आप खुद कि कंपनी एन्जोय
करते है कि खुद से बोर हो जाते है ?
2) क्या आप खुद को प्यार करते है ?
3) क्या आप जिंदगीसे प्यार करते है ?
तीनो सवालों के जवाब सहि है तो आप
अकेले हो या भीड में अकेलापन महेसूस
नहि करोगे । उस के लिए आप को
मेडीटेस करना होगा, आईने के सामने
खडा करके सकारात्म अफरमेशन देना
होगा और दूसरों के जीवन में वेल्यू एड
करना हो तो आप को खुशी मिलेगी तो
आप अकेलापन का शिकार नहि होंगे ।
विनोद आनंद 01/03/2020
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1821 उमीद के दो पहेलू

उमीदो से जीवन बनता है
और जीवन बीगडता भी है ।
निष्फलता से निराश मत हो
उमीद रखो फिर प्रयास करो
एक दिन होंगे कामीयाब,यह है
उमीद का सकारात्मक पहेलू ।
आदमी उमीदो के बल पर
जिंदा रह शकता है, उमीद
हि जीवन कि साँसे है ।
उमीदें छुट गई तो जीवन टूट
के, हो जाएगा चकनाचूर ।
उमीद से मुह न मोडना वरना
सफलता रूढ जाएगी, निराशा
और विफलता घर कर जएगी ।
उमीद का दूसरा नकारात्मक
पहेलू है, कि दूसरों से उमीदें न
रखना वरना निराशा और
दुःख के बादल बरसने लगेंगे ।
हमने दूसरोंसे कई उमीदें पाली है ।
जब वो तुम्हारी उमीदें पूरी नहि
करते तब चोट लगती है और
जीवन तहेस महस हो जाता है ।
जीवन सुख शांति से, तनाव
मुक्त जीना है तो किसी से भी
कोई उमीद न रखना, जीवन
में कभी दुःख आएगा हि नहि ।
उस का दूसरा पहेलू है कि आप
किसी कि उमीद पूर्ण करो फिर
देखो कितना सुख मिलेगा ।
किसी से मदद कि उमीद या
कुछ लेने कि उमीद मत रखो ।
किसी से मदद करनेका ईरादा
रखो या कुछ देने कि ईच्छा रखो ।
खुद से उमीद रखो, दूसरों से
नहि, हो शकेतो दूसरों कि उमीदें
पूर्ण करने कि कोशिश करो तो
जिंदगी हलकी और आसान होगी ।
दोनों पहेलूओ को सकारात्म तरीके से
ईस्तमाल करो तो जीवन सफल होगा ।
विनोद आनंद 12/12/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1790 हम दुःखी कब होते है

हम दुःखी अपनी नकारात्मक
सोच से होते है, सकारात्मक
सोचो तो दुःखी नहि होगे ।
हम भूतकाल में और भविष्य में
जीते है वर्तमान में जीते नहि,
ईसलिए दुःखी होते है ।
हमारे पास जो है,उसे हम खुस
नहि है, जो नहि उसे दुःखी होते है ।
हम दूसरों कि खुस से दुःखी है ।
हम प्रतिकूल और ना पसंद
परिस्थिति में दुःखी होते है ।
हम हमारी खराब आदतों कि
वज़ह से दुःखी होते है ।
हम सुखमें दुःखको याद करके
दुःखी होते है । हम अपने गलत
व्यवहार से भी दुःखी होते है ।
हम अपनी गलतीयों, समस्यासे
दुःखी होती है ।
हमारी ईच्छा या अपेक्षा पूर्ण नहि
होती तो हम दुःखी होते है ।
दुःख से प्रभावित होकर हम दुःख
को पनाह देकर दुःखी होते है ।
दुःख हमारे साथ बहुत देर तक
चला, दुःख हार, हमे जीत गए ।
हमे दुःख, दुःखी न कर शका ।
दुःख से न गभराना, न डरना या
न दुःखी होना और सुख दुःख में
समत्व रखना तो दुखी नहि होंगे ।
विनोद आनंद 15/11/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड