1698 गुस्सा का विज्ञान-2

गुस्सा खुद को, दूसरे को
सुधारने के लिए, अन्याय के
खिलाफ, किसी के कल्याण
कि खातिर करना चाहिए ।
यह गुस्से का सकारात्मक
पहेलु है । एक ओर पहेलू
है कि अगर कोई आपका
किसी कारण से अपमान
करे तो उस के बदले में
तुरंत गुस्सा नहि करके वो
गुस्से को जिंदा रखके जिस
वज़ह से अपमान किया है
उस वज़ह को हि दूर कर
के मुह तोड जवाब देना है ।
गुस्से का नकारात्मक ढंग
से बढावा नहि देना है, जो
किसी के लिए अच्छा नहि ।
कोई गुस्सा करे तो आप
खुद पे नियंत्रण करके चुप
रहे और उस के प्रति क्षमा
का भाव प्रगट करे तो उस
का गुस्सा शांत हो जाएगा ।
किसी भी वज़ह से अगर
गुस्सा करना है तो होश
में रह कर गुस्सा करो,
लेकिन उस का रेगुलेटर
आप के पास रखो और
बात बढने से पहेले गुस्से
को शांत करना जरूरी है ।
गुस्से तन और मन पर भी
बहुत बुरा अशर होता है ।
संबंध बिगते है और संबंध
बिगडने से जीवन बिगडता है ।
गुस्सा वो ज्वालामूखी है,जो
सब कुछ जला के राख कर
देता है जिंदा रहते है मगर
जिंदगी छिन लेता है । अगर
आप उस के शिकार है तो
आप शिकारी बन के उस
का शिकार करके जीवन
को सुख शांति से भर दो ।
विनोद आनंद 16/08/2019 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

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1674 गलतियाँ

ईन्सान गलतियाँ करता है
लेकिन सुधरता नहि और
उस से सबक शीखता नहि,
लेकिन गलती दोहराता है ।
ईन्सान गलतियों का पूतला है ।
ईन्सान गलतियाँ बार बार
करके मुश्केलियाँ बढाता है ।
गलतियाँ जाने अनजाने में हो
जाती, जान बुजकर गलतीयाँ
करना मूर्खता कि निशानी है ।
बीना सोच समज से किया
काम अक्सर गलत होता है ।
गलती से बचना है तो सोच
समज कर काम करना चाहिए ।
गलतियाँ सफलता का बैरी है ।
गलतियाँ निष्फताका दोस्त है ।
गलतियाँ से नुकशान होता है ।
सावधान, गलत काम करने से
पहेले सोचो और काम न करो ।
गलतियाँसे रिश्ता तोडो,सुधारसे
रिश्ता जोडो तो होंगे कामयाब ।
गलतियाँ नाकामीयबी का बीज है ।
गलतियों से बचो, निष्फलता बचो ।
विनोद आनंद 24/07/2019 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1504 रोगों का ढेर

मानव का तन, मन और जीवन
रोगों का ढेर है । तन और मन के
रोगों का ईलाज़ डोक्टर करे ।
हम जीवन में कई एसे रोगों को
जाने अनजाने पनहा देते है, उस
का जिक्र करना जरूरी है क्यूँ कि
उसका ईलाज कर शके वरना
जीवन को खोखला कर देंगे ।
* क्या कहेगें लोग-सब से बडा रोग ।
* मन मानी करना ।
* मैं ठीक हूँ सब गलत है ।
* किसी कि बात नहि सूनना
* दूसरों कि भूल निकालना ।
* नकारात्मक विचार करना ।
* मन-ईन्द्रयों कि गुलामी करना ।
* फरियाद करना,कमीयाँ निकालना।
* मैं कहेता हूँ या करता हूँ वो सच है ।
* काम चोरी,काम को कल पर छोडना ।
* खुद कि प्रशंसा करना दूसरों कि नहि ।
* दूसरों को सलाह देना और सुधारना ।
जीवन में यह सभी रोगों न हो तो जीवन
मधुवन और स्वर्ग बन जाए ।
विनोद आनंद 17/02/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1462 शेर शायरीयों का गुलदस्ता-75

🌹 शंका कुशंका
मन मे शंका कुशंका है
तो मन बनेगा कमजोर ।
अज्ञान से जन्मे शंका-कुशंका ।
ज्ञान या जानकारी से शंका
कुशंका का हो जाए नास ।
मन में शंका कुशंका पालोगे
तो जिंदगी होगी असफल ।
🌻 पहेले खुद…फिर दूसरे
खुद को जो करता नहि प्रेम
कैसे करेगा प्रेम दूसरों को ।
खुदको जो नहि समजा शकता
कैसे समजाएगा दूसरों को ।
जो खुद को नहि सुधारता वो,
कैसे सुधार शकता है दूसरों को ।
खुद जीनेका सही तरिका शीखे
तो फिर दूसरे शीख लेंगे देखकर ।
🌺 सही सोच
गलत सोच को भगाना या
गलत सोचना नहि तो गलत
सोच से मिलेगी मुक्ति ।
सही सोच, बडी सोच से
मिलेगी सही राह, मंझिल ।
सही मंझिल से मिलेगी
सही सफलता जीवनमें ।
🍀सावधान
किस को, कहाँ ‘ना’ कहेना या
‘हा’ कहेना है सोचने कि बात ।
बिना सोचे ‘हा’ या ‘ना’ कहेके
पस्तना पडेगा सावधान ।
विनोद आनंद 17/01/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1447 कहेवते

बातें है पुराणी फिर भी है
ताजी, सच्ची, प्रसिध्ध और
कहती है जीवन का मर्म
ईसलिए उसे कहते,कहेवते ।
लेकिन वो बातें भूल गए है हम
जिसे पढना है समजना है
और जीवन में उतारना है ।
वो बातें है….. जैसा कर्म
करेगा एसे फल मिलेगा ।
पेड बबूल का बोओगे तो
आम कहासे खाओगे ।
बस यह समज लिया तो
सुधर जाएगा जीवन ।
कहेवते है गुरू,साथी और
मार्गदर्शक । कहेवते है
जीवन का निचोड, ज्ञान
का भंडार । बीना ज्ञान
जीवन निरस, कहेवते
बीना है जीवन सुना ।
कहेवते है जीवन का
श्रींगार, सँवारे जीवन ।
कहेवते कदी ना भूलना ।
दोहराते रहेना ।
कहेवत : संग एसा संग ।
कल करे सो आज कर
आज करे सो अब,पल में
परलय होगा, बहोरी
करेगा कब । काम क्रोध
और लोभ नर्क के द्वार ।
कहेवतो को ढूँढनते रहो
सुनते रहो और जीवन में
समजकर उतारते रहो ।
विनोद आनंद 01/01/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1441 निंदा-आलोचना का भेद

निंदा करना बूरी बात है
आलोचना करना ईतनी
बूरी बात नहीं । क्यूँ कि
निंदा धृणा से नीचे गीराने
के लिए कि जाती है और
आलोचना करूणा से उँचे
उठाने के लिए कि जाती है ।
निंदा पीठ पिछे कि जाती है
और आलोचना सामने ।
निंदा निंद उडा देती है तो
आलोचना जगा देती है ।
खुद का अहंम कि पुष्ठि के
लिए निंदा कि जाती है तो
आलोचना दूसरों में सुधार
के लिए कि जाती है ।
निंदा आत्म को पीडीत
करती है आलोचना आत्मा
का कल्याण करती है ।
दुष्ट लोग निंदा करते है
lगुरू – संत अपने शिष्य कि
कठोर आलोचना करते है ।
निंदा मीटाने के ईरादे से
कि जाती है और आलोचना
नेक ईरादे से सत्य कि
खोज के लिए कि जाती है ।
कठोर आलोचना मैत्री पूर्ण
होती है और मीठी निंदा
जहेर समान होती है ।
निंदक चोर कि और आलोचक
चोरी कि धृणा करता है ।
निंदक पापी कि और आलोचक
पापा कि धृणा करता है ।
आलोचक बनो निंदक नही ।
आलोचक हो या निंदक हमे
सकारात्मता से देखना है ।
विनोद आनंद 30/12/2018
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1402 हम यह भूलें करते है-3

कहेते है कि मनुष्य मात्र भूल के
पात्र लेकिन भूल बार बार करना
मुनासीत नही है फिर भी हम भूलें
करते है क्यूँकि आदत से मजबूर ।
* हम जिंदगी को मोज मस्ती, एसो
आराम का अवसर समज ने कि
भूल करके जिंदगी को बहेतरीन
बनाने का अवसर गवा देते है ।
* हम परिवार में 100% जिम्मेदारी
नही निभाने कि भूल करके संबंध
कमजोर बनाने कि भूल करते है ।
हम बेकार कि बातों में, कामो में
जिंदगी का किमती समय गवा ने
कि भूल करते है,कुछ नही करपाते ।
* हम अपना काम समयसर नही
करने कि और नियमीत नही बनने
कि भूल करते है, बहाने बनाते है ।
* हम नकारात्मकता को अपना ने कि,
सकारात्मक नही बनने भूल करते है ।
* हम हमारी सुख शांति के लिए दूसरों
को जिम्मेदार समजने कि भूल करते है ।
* हमे जो करना है वो नही करने कि,
नही करना है वो करने कि भूल करते है ।
* हम छोटी बात को बढा के बडी बनाने
कि भूल करके जिंदगी में दुःखी होते है ।
हमे भूल कि दुनिया को छोड कर एक
अच्छे ईन्सान कि भाँति जीना है ।
भूलें सुधार ले तो जिंदगी सुधार जाएगी ।
विनोद आनंद 26/11/2018
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड