1941 शब्दों से सफलता

सफलता सें कामीयाबी
का एहेसास होता है ।
कामीयाबी से जिंदगी
बहेतरीन बनती है ।
शब्दों में शक्ति है उस का
अशर होता है अगर आप
उसे प्रभावीत हो और दिल
दिमाग में उतर जाए ।
फिर दिल दिमाग हि आप को
सफलता दिला एगा वरना वो
कमाल नहि दिखाए पाएगा ।
शब्दो का असर होता है चाहे
वो सकारात्म या नकारात्म ।
नकारात्म शब्द अधोगति और
सकारात्म ऊर्धव गति देते है ।
जीवन में सकारात्म शब्दो का
ईस्तमाल करने कि आदत हो
तो शब्दों से सफलता मिलेगी ।
लेकिन उसे के लिए जागृत रहे
और ईस्तमाल करने से पहेल
कुछ क्षण सोच कर सकारात्मक
शब्दों का हि प्रयोग करे और
सफलता के अधिकारी बने,
वरना सफलता नहि मिलेगी ।
विनोद आनंद 24/03/2020
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1928 औकात क्या है ?

औकात में मत रहो
औकात से ज्यादा
कुछ किया जाए वो
हि सच्ची सफलता है ।
ईसलिए औकात में
मत रहो, हर दिन
औकात बढाते रहो ।
औकात क्या है और
उसे कौन बनाता है ?
औकात हेसियत है ।
आप खुद के बारे में
क्या सोचते हो वो हि
आप कि औकात है ।
औकात को अपनी
जंजीर मत बनाओ ।
औकात खुद कि राय
है खुद के बारे में ।
औकात भूतकाळ कि
बातें और अनुभव से
बनती है,खुद कि सोच से
बनती है और दूसरो कि
सोच या बातों से बनती है ।
लेकिन आप कि औकात
वो नहि जो दूसरें लोग
आप के बारे में सोचते है ।
अपनी सोच ईतनी मजबूत
और बढीया बनाओ कि आप
कि औकात बढती हि रहे ।
अगर भविष्य बनाना है तो
औकात में मत रहो, औकात
बढाते रहो और कामीयाब
होते रहो ।
विनोद आनंद 14/03/2020
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1855 सोच से सृष्टि का निर्माण

सोच से संकल्प बनता है ।
संकल्प से सृष्टि बनती है ,
सोच से सहेद बनता है ।
सोच से कर्म बनते है और
कर्म से किस्मत बनती है
सोच से माहोल बनता है ।
सोच ही सब कुछ है तो
गलत सोच ने कि भूल
करने कि हिंमत क्यू करे ?
हर एक ईन्सान कि बूरी
सोच वातावरण को दूषित
करती है और वो हि दूषित
वातावरण ईन्सान कि
सोच को बूरी कर देती है ।
यही सिलसीला नर्क जैसी
सृष्टि का निर्माण करती है,
जिस के जिम्मेदार हम है ।
हर शख्स अच्छा सोचे तो
माहोल अच्छा बनता है
और सृष्टि स्वर्ग बनेगी ।
अच्छा सोचना समझदारी
है, बूरा सोचना बेवकूफि ।
अच्छी सोच, अच्छे संकल्प,
अच्छे कर्म सिर्फ तुम्हारी हि
किस्मत नहि लिखती, सृष्टि
कि भी किस्मत लिखती है ।
अब सोचो,आप कैसा सोचोगे
अच्छा या बूरा, सहि या गलत ?
विनोद आनंद 11/01/2020
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1808 खुबसुरत जिंदगी

जिंदगी बहुत खुबसुरत है
उसे बदसुरत मत बनाना ।
अनमोल मानव जन्म मिला,
खुबसुरत प्रकृति और नजारें,
जिंदगी को खुबसुरत बनाना ।
मानव के पास शक्तिशाली मन
पांच ज्ञानेन्द्रियाँ से ज्ञान प्राप्ति,
कर्मेन्द्रियाँ से काम करने कि
क्षमता, तुम्हे श्रेष्ठ बना शकती है ।
जिंदगी को खुबसुरत बनाने कि
चाहत,खुबसुरत अभिगम जिंदगी
को खुबसुरत बना शकती है ।
यह नहितो जिंदगीकि खुबसुरती
का मझा नहि लूट शकते ।
जैसी द्रष्टि ऐसी जिंदगी,
जैसी सोच एसी जिंदगी,
जैसा कर्म एसी जिंदगी ।
अच्छि सोच, सकारात्मक
द्रष्टि और सत्कर्म से जिंदगी
को सँवारना तो जिंदगी कि
खुबसुती नजर आएगी ।
विनोद आनंद 29/11/2019 फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1790 हम दुःखी कब होते है

हम दुःखी अपनी नकारात्मक
सोच से होते है, सकारात्मक
सोचो तो दुःखी नहि होगे ।
हम भूतकाल में और भविष्य में
जीते है वर्तमान में जीते नहि,
ईसलिए दुःखी होते है ।
हमारे पास जो है,उसे हम खुस
नहि है, जो नहि उसे दुःखी होते है ।
हम दूसरों कि खुस से दुःखी है ।
हम प्रतिकूल और ना पसंद
परिस्थिति में दुःखी होते है ।
हम हमारी खराब आदतों कि
वज़ह से दुःखी होते है ।
हम सुखमें दुःखको याद करके
दुःखी होते है । हम अपने गलत
व्यवहार से भी दुःखी होते है ।
हम अपनी गलतीयों, समस्यासे
दुःखी होती है ।
हमारी ईच्छा या अपेक्षा पूर्ण नहि
होती तो हम दुःखी होते है ।
दुःख से प्रभावित होकर हम दुःख
को पनाह देकर दुःखी होते है ।
दुःख हमारे साथ बहुत देर तक
चला, दुःख हार, हमे जीत गए ।
हमे दुःख, दुःखी न कर शका ।
दुःख से न गभराना, न डरना या
न दुःखी होना और सुख दुःख में
समत्व रखना तो दुखी नहि होंगे ।
विनोद आनंद 15/11/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1745 दुनिया

दुनिया के दो प्रकार एक
बहार कि दुनिया, दूसरी
दुनिया है अंदर कि जो
खुद को दिखती है ओर
किसी को नहि । बहार
कि दुनिया खुद को जो
दिखती है वो है, सब को
बहार कि दुनिया अलग
अलग दिखती है, मतलब
जैसी जिस कि द्रष्टि,जैसी
जिस कि सोच एसी हि
सृष्टि-दुनिया दिखती है ।
बहार कि दुनिया अंदर कि
दुनिया को बदल शकती है ।
बहार कि चका चौद से अंदर
कि दुनिया पर गहेरा प्रभाव
होता है । अंदर कि दुनिया
भी बहार कि दुनिया पर
गहेरा प्रभाव डाल शकती है ।
उस के लिए पहेले अंदर कि
दुनिया का कोई बूरा प्रभाव
न पडे,उस का अभ्यास करो ।
अंदर कि दुनियाको शक्तिशाली
बनाओ, बहार कि दुनिया के
माहोल से बचकर रहना शीखे ।
बहार कि दुनिया कैसी भी हो
मगर अंदर कि दुनिया शुध्ध
पवित्र और स्थित पज्ञ हो तो
बहार कि दुनिया का माहोल
तुम्हे चलीत नहि कर शकता ।
किसी कि बातों में आके अंदर
कि दुनिया को न बीगाडना ।
जो अंदर होगा, वो हि बहार
जीवन में अभिव्यक्त होगा ।
अंदर कि दुनिया आबाद तो
बहार कि दुनिया आबाद ।
अंदर कि दुनिया आबाद
बनती है अच्छे विचारों से
अच्छी भावनाओं से और
अच्छी ईच्छाओं से ।
विनोद आनंद 03/10/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड

1730 विचार शुध्धि कैसे करे ?

जिंदगी का महत्त्वपूर्ण
हिस्सा है आपके विचार ।
जैसे विचार के बीज एसा
जीवन बनेगा । जैसे जीवन
बनाना एसै विचार करो ।
विचार का शुध्धिकरण करना
आवश्यक, जरूरी है, वरना
अशुध्ध-अपवित्र विचारों से
जीवन का घडतर नहि होगा ।
विचार शुध्धिकरण कैसे करे ?
विचारों का उदभव स्थान मन है,
अच्छी माहिती-ज्ञान से विचार
शुध्धि कर शकते है ।
जीवन में सद् वांचन,सद्श्रवण,
सद् संग से विचारों का शुध्धि
करण हो शकता है ।
हमे मन का चोकिदार बनना
होगा, जिसे अपने मन में शुभ,
मंगळ विचार स्टोर कराना है ।
अशुभ अमंगल बिचारों को
मन में घुसने नहि देना है ।
विचारों का शुध्धि मेडीटेशन,
प्रार्थना, मात पिता, गुरु के
संस्करों से होती है ।
प्रकृति के संग थोडा समय
व्यतित करने से विचारों का
शुध्धिकरण कर शकते है ।
क्यूँ कि वो शुध्ध पवित्र और
निर्मल स्वरूप है जिसे तुम
विचा शुध्धि कर शकते हो ।
मन को बार बार कहो कि
“मैं शुध्ध,पवित्र,प्रेम,ज्ञान
शांत,आनंद स्वरुप आत्मा हूँ ”
जिस से चित शुध्धि और
चिचार शुध्धि हो शकती है ।
विनोद आनंद 18/09/2019
फ्रेन्ड,फिलोसोफर,गाईड